वाराणसी में बसंत पंचमी पर हुआ बाबा विश्वनाथ का तिलकोत्सव...रंगभरी एकादशी तक चलेगा मांगलिक अनुष्ठान, भक्तों में प्रसाद बांटी गई...
वाराणसी ब्यूरो, शुभम गुप्ता। देवाधिदेव महादेव की अविनाशी नगरी काशी में बसंत पंचमी पर बाबा के तिलकोत्सव पर काशीवासी लीन-तल्लीन रहे। 500 पुरानी लोकपरंपरा के अनुसार बाबा विश्वनाथ का तिलकोत्सव श्रद्धा, उल्लास और भक्तिभाव के साथ मनाया गया। टेढ़ीनीम स्थित काशी विश्वनाथ मंदिर के महंत आवास पर बाबा विश्वनाथ की पंचबदन चल प्रतिमा का विधि - विधानपूर्वक तिलक किया गया। यह तिलकोत्सव काशीवासियों की ओर से लोकाचार के रूप में संपन्न होता है, जिसमें संपूर्ण काशी बाबा के सगुन में सहभागी बनती है।
मांगलिक अनुष्ठानों की शुरुआत
काशी की परंपरा में बसंत पंचमी केवल ऋतु परिवर्तन का पर्व नहीं, बल्कि बाबा विश्वनाथ के विवाह उत्सव से जुड़े मांगलिक अनुष्ठानों की औपचारिक शुरुआत होती है. इसी परंपरा के निर्वहन के क्रम में महंत आवास पर संपन्न होने वाला तिलकोत्सव काशी की सांस्कृतिक और धार्मिक चेतना का जीवंत उदाहरण है, जहां देवता और भक्त के बीच औपचारिक दूरी नहीं, बल्कि पारिवारिक भाव का सजीव दर्शन होता है।
पहली बार लिंगिया महाराज ने चढ़ाया तिलकोत्सव
बसंत पंचमी (शुक्रवार) को दशाश्वमेध स्थित सिद्धपीठ बड़ी शीतला माता मंदिर के श्रीमहंत शिवप्रसाद पाण्डेय लिंगिया महाराजय ने पहली बार काशीपुराधीश्वर बाबा विश्वनाथ का तिलकोत्सव चढ़ाया. यह अवसर काशी की धार्मिक परंपरा में विशेष महत्व का रहा, क्योंकि शीतलाधाम महंत परिवार की ओर से बाबा के तिलकोत्सव का यह पहला लोकाचार था।
बांसफाटक से निकली तिलक यात्रा
बांसफाटक स्थित श्री यंत्र पीठ से श्रीमहंत लिंगिया महाराज के नेतृत्व में भव्य तिलक यात्रा निकाली गई. यात्रा में 21 वैदिक बटुकों द्वारा मंत्रोच्चार किया गया. शहनाई की मधुर धुन, डमरूओं के निनाद और शंखध्वनि के बीच 51 थालों में सजे बाबा के तिलक का चढ़ावा और 56 भोग की थालियां लेकर काशीवासी तिलकहरु हर हर महादेवय का उद्घोष करते हुए टेढ़ीनीम स्थित महंत आवास पहुंचे।
डमरू, शंख और जयघोष से भक्तिमय हुआ क्षेत्र
डमरूओं के नाद और हर हर महादेव के गगनभेदी उद्घोष से पूरा टेढ़ीनीम क्षेत्र भक्तिमय हो गया. गलियों से गुजरती तिलक यात्रा को देखने के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी. काशीवासियों के लिए यह दृश्य केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही लोकपरंपरा का साक्षात दर्शन था।
माता के गौना तक उत्सव
इस तिलकोत्सव के साथ ही काशी की उन लोकपरंपराओं का शुभारंभ हो गया, जो बाबा विश्वनाथ के विवाह उत्सव से जुड़ी मानी जाती हैं. बसंत पंचमी से आरंभ होकर यह मांगलिक अनुष्ठान श्रृंखला रंगभरी एकादशी पर माता गौरा के गौना तक निरंतर चलती रहती है. इस दौरान काशी में बाबा के दूल्हा स्वरूप की कल्पना और उससे जुड़े लोकाचार काशीवासियों की भावनाओं में विशेष स्थान रखते हैं.।
चार वेदों के विद्वानों ने कराया पंचबदन प्रतिमा का विशेष पूजन
महंत आवास पर तिलकोत्सव से पूर्व परिवार की वरिष्ठ सदस्य मोहिनी देवी के सानिध्य में अंकशास्त्री महंत वाचस्पति तिवारी द्वारा विशेष वैदिक पूजन संपन्न कराया गया. आचार्य सुशील त्रिपाठी के आचार्यत्व में चारों वेदों के वैदिक विद्वानों ने मंत्रोच्चार के साथ बाबा विश्वनाथ की पंचबदन चल प्रतिमा का पूजन किया. ऋग्वेद से पं. लक्ष्य पुणतांबेकर, यजुर्वेद से पं. ऋषभ पांडेय, सामवेद से पं. अनिमेष दातार और अथर्ववेद से पं. गौरव रटाटे सहित कुल 11 वैदिक ब्राह्मणों की उपस्थिति में यह अनुष्ठान संपन्न हुआ।
भोग आरती के बाद हुआ बाबा का भव्य राजसी श्रृंगार
दोपहर भोग आरती के उपरांत संजीव रत्न मिश्र (भानू मिश्र) द्वारा बाबा विश्वनाथ का परंपरागत भव्य राजसी श्रृंगार किया गया. पंचबदन प्रतिमा को विशेष वस्त्रों, आभूषणों और पुष्पों से सुसज्जित किया गया, जिससे बाबा का स्वरूप अत्यंत दिव्य और आकर्षक प्रतीत हुआ. श्रृंगार दर्शन के लिए श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह देखने को मिला।
लोकाचार में शामिल हुए काशीवासी
टेढ़ीनीम महंत आवास पर काशीवासी तिलकहरुओं का स्वागत मनोज शर्मा ने किया. इसके बाद महंत वाचस्पति तिवारी और श्रीमहंत शिवप्रसाद पाण्डेय लिंगिया महाराजय के मध्य विधिवत लोकाचार संपन्न कराया गया. शीतलाधाम महंत परिवार के श्रीमहंत लिंगिया महाराज, उनके छोटे भाई महंत पुरुषोत्तम पांडेय और उपमहंत कल्लू महाराज की उपस्थिति में बाबा विश्वनाथ का तिलकोत्सव विधिपूर्वक संपन्न हुआ. 56 प्रकार के भोग अर्पित किए गए और वैदिक मंत्रों के बीच आरती की गई।
काशी की आत्मा है यह लोकपरंपरा
तिलकोत्सव के दौरान श्रीमहंत लिंगिया महाराज ने कहा कि काशी में बसंत पंचमी केवल एक पर्व नहीं, बल्कि बाबा विश्वनाथ के सगुन और मांगलिक अनुष्ठानों की शुरुआत का प्रतीक है। टेढ़ीनीम स्थित महंत आवास पर होने वाला यह तिलकोत्सव काशी की विशिष्ट लोकपरंपरा है, जिसमें बाबा विश्वनाथ को दूल्हे के रूप में तिलक किया जाता है. यह परंपरा सनातन आस्था, पौराणिक मान्यताओं और काशी की सांस्कृतिक विरासत का जीवंत उदाहरण है. इस लोकाचार में न केवल मंदिरों और महंत परिवारों की भूमिका होती है, बल्कि आम काशीवासी भी पूरे श्रद्धा और उल्लास के साथ भाग लेते हैं. यही कारण है कि काशी में देवता और भक्त के बीच कोई औपचारिक दूरी नहीं दिखाई देती, बल्कि एक पारिवारिक संबंध का भाव दृष्टिगोचर होता है।
रंगभरी एकादशी तक चलेगा मांगलिक अनुष्ठान
बसंत पंचमी से आरंभ हुए यह मांगलिक अनुष्ठान रंगभरी एकादशी तक चलते रहेंगे. इस दौरान काशी में बाबा विश्वनाथ और माता गौरा से जुड़ी अनेक लोकपरंपराएं निभाई जाएंगी। काशीवासियों के लिए यह समय केवल धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक पहचान और लोकआस्था को जीवित रखने का अवसर भी है।
बाबा विश्वेश्वर का तिलक उत्सव
वहीं श्री काशी विश्वनाथ मंदिर में भगवान श्री विश्वेश्वर का तिलक उत्सव श्रद्धा, भक्ति एवं उल्लास के साथ हुआ. मंदिर के शास्त्रियों द्वारा बाबा विश्वेश्वर की पंचबदन प्रतिमा का विधि-विधान से पूजन-अर्चन कराया गया. पूजन के दौरान संपूर्ण मंदिर परिसर भक्तिमय वातावरण से परिपूर्ण रहा. पूजन के पश्चात मंदिर में उपस्थित श्रद्धालुओं को प्रसाद का वितरण किया गया. तिलक उत्सव के अवसर पर बड़ी संख्या में भक्तों ने दर्शन कर पुण्य लाभ प्राप्त किया।