वाराणसी का ऐतिहासिक मणिकर्णिका घाट अब पुनर्निमाण के बाद ऐसा दिखेगा, जानिए...
अद्भुत है भगवान भोले की नगरी काशी का मणिकर्णिका घाट और अनूठी है इस घाट से जुड़ी मान्यताएं और पौराणिक कहानियां। इस घाट को महाश्मशान भी कहा जाता है। कहते हैं यहां चिता की अग्नि कभी ठंडी नहीं होती है। मान्यता है कि औघड़ रूप में भगवान् शिव यहां विराजते हैं। पौराणिक ग्रंथों में वर्णित इस घाट की महिमा को और प्रत्यक्ष रूप में बाबा भोलेनाथ को अनादि काल से मौजूद बताया जाता है।
जब ये घाट बसा तो गंगा नहीं थी...
कहते हैं भगवान शिव ने मणिकर्णिका घाट अपने रहने के लिए बसाया था। जब ये घाट बसा तो गंगा नहीं थी, बल्कि एक कुंड हुआ करता था। स्नान करते वक्त भगवान शिव के कान का कुंडल उस कुंड में गिर गया और तब से इसका नाम मणिकर्णिका पड़ गया। अब चूंकि भगवान शिव यहां वास करते हैं, इस लिए यहां मृत्यु को भी मंगल माना जाता है।
सैंकड़ों सालों से इस घाट पर चिताएं जलती आ रही हैं। जैसे-जैसे वक्त बदला इसम घाट के स्वरूप में भी बदलाव हुआ, लेकिन इस बार बड़ा बदलाव नजर आने वाला है। महाश्मशान घाट के पुनर्विकास का कार्य शुरू हो चुका है। ये कार्य सीएसआर फंड से 18 करोड़ रुपये में किया जाना है। इस कार्य को नगर निगम की देख-रेख में कार्यदायी नाम की संस्था कर रही है।
29 हजार वर्गमीटर एरिया में काम कराया जाना है
मणिकर्णिका घाट के पुनर्निर्माण का काम करीब 29 हजार वर्गमीटर एरिया में काम कराया जाना है। मिट्टी दलदली है, इसलिए पहले 15 से 20 मीटर नीचे तक पाइलिंग कराई गई है, जिससे बाढ़ के वक्त किसी भी तरह की दिक्कत न हो। अब पक्के घाटों के पत्थरों को तोड़ा जा रहा है और बड़ी नाव की मदद से गंगा पार भेजा जा रहा।
...ताकि चिता की राख घरों में न जाए
मॉनसून में पूरा घाट जलमग्न होता है, लेकिन पुनर्निमाण के बाद ये मुश्किल दूर हो जाएगी। गंगा के अधिकतम जलस्तर से ऊपर दो स्तर प्लेटफॉर्म तैयार कराए जाएंगे। यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ बताते हैं कि निचले स्तर पर 18 प्लेटफॉर्म होंगे और ऊपर वाले स्तर पर 19. चिता जलाते वक्त निकलने वाले धुएं के लिए खास इंतजाम किए जा रहे हैं। इस श्मशान घाट पर 25 मीटर ऊंची चिमनी लगाई जाएगी, ताकि चिता की राख हवा के साथ उड़ जाए और आसपास के घरों में न जाए। दाह संस्कार क्षेत्र में वेटिंग एरिया और चेंजिंग रूम का भी निर्माण कराया जा रहा है।
पुनर्निर्माण के बाद मणिकर्णिका घाट पर आखिरी संस्कार से जुड़े हर रिवाजों के लिए अलग इंतजाम किए जा रहे हैं। शवों के स्नान के लिए जलकुंड के साथ मुंडन क्षेत्र बनाया जा रहा है। साथ ही लकड़ी भंडारण क्षेत्र का निर्माण किया जाएगा। इस घाट पर दो सामुदायिक शौचालय का निर्माण भी कराया जाएगा। पूरा निर्माण कार्य चुनार और जयपुर के पत्थरों से किया जाएगा।