नईदिल्ली : क्यों UGC गाइडलाइंस को बताया जा रहा असंवैधानिक, क्यों ये कानून नहीं, क्या करेगा सुप्रीम कोर्ट? जानें पूरी डिटेल...
नईदिल्ली ब्यूरो। क्या आपको मालूम है कि यूजीसी द्वारा लागू किया गया समानता नियम 2026 असल में केवल एक गाइडलाइंस या नया नियम है, जिसे यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन ने 15 जनवरी को देश के सभी कॉलेजों और उच्च शिक्षा संस्थानों के लिए नोटिफाई किया गया है। इसके बाद देशभर में इसके विरोध की बाढ़ आ गई है. बहुत से लोगों को लग रहा है कि ये संसद से पारित कानून है. असल में इसे संसद में बिल के तौर पर पारित नहीं किया गया. इसके संवैधानिक प्रारूप को लेकर भी बहस जारी है, इसी वजह से ये मामला एक पीआईएल के जरिए सुप्रीम कोर्ट में पहुंच गया है।
UGC ने समानता भेदभाव संबंधी नियम को 13 जनवरी 2026 को आधिकारिक तौर पर अधिसूचित किया। 15 जनवरी 2026 से सभी विश्वविद्यालय और कॉलेजों पर लागू कर दिया गया।
पहले तो हम ये जानेंगे कि ये किसी नियम और कानून में क्या अंतर होता है, फिर आगे ये बताएंगे कि क्यों इसे संसद से पास नहीं करके केवल यूजीसी द्वारा नोटिफाई किया गया। इसी बात को लेकर इसके संवैधानिक नेचर को चुनौती दी जा रही है।
यूजीसी गाइडलाइंस और संसद से पारित कानून में क्या अंतर
संसद से पारित कानून लोकसभा और राज्यसभा में बहस, वोटिंग के आधार पर बनता है, जिस पर राष्ट्रपति की मंजूरी भी जरूरी है. इसे फिर गजट के जरिए नोटिफाई किया जाता है. तो इस तरह कानून बनता है और उसे संविधान के तहत विधाई शक्ति हासिल हो जाती है।
वहीं यूजीसी गाइडलाइंस के नियम का मतलब एक वैधानिक निकाय द्वारा बनाया गया नियम है. इसमें संसद में न बहस, न वोटिंग. बस मंत्रालय की सहमति जरूरी होती है और फिर उसके बाद ये नोटिफिकेशन से लागू हो जाता है. लेकिन यहां ये रखना जरूरी है कि चूंकि यूजीसी खुद यूजीसी एक्ट 1956 से बनी थी, लिहाजा वो इस एक्ट के तहत संवैधानिक शक्ति रखती है. लेकिन मूल अधिकारों पर इसका असर सीमित और नियंत्रित होता है. ये कह सकते हैं कि गाइडलाइंस हमेशा कानून से नीचे होती है, उसके बराबर नहीं।
इसमें दंड की शक्ति कितनी
अब जानते हैं कि दंड की शक्ति किसमें कितनी होती है. संसद का कानूनी अपराध तय कर सकता है. सजा, जुर्माना और जेल की सजा दे सकता है, हालांकि इसका फैसला एक न्यायिक प्रक्रिया के जरिए होता है. वहीं यूजीसी की गाइडलाइंस आपराधिक सजा नहीं दे सकती. केवल संस्थागत कार्रवाई कर सकती है. कॉलेजों और उच्च शिक्षा संस्थानों पर मान्यता और अनुदान से जुड़ी कार्रवाई कर सकती है. यही वजह है कि UGC नियमों को "कानून जैसा" बताने पर विवाद होता है।
क्या यूजीसी गाइडलाइंस मूल अधिकारों को नया अर्थ नहीं दे सकती?
संसद का कानून मूल अधिकारों को प्रभावित कर सकता है. यूजीसी गाइडलाइंस मूल अधिकारों को नया अर्थ नहीं दे सकती है ना ही प्रतिबंध लगा सकती है. अगर ऐसा हुआ तो उसे असंवैधानिक घोषित किया जा सकता है।
यूजीसी के नए नियमों का विरोध.
संसद के कानून को कोर्ट बहुत सोच-समझकर रद्द करती है. लेकिन यूजीसी गाइडलाइंस को लेकर ऐसा नहीं है. अगर कोर्ट को जरा भी लगेगा कि ये गाइडलाइंस खुद एकतरफा या मनमानीपूर्ण है तो तुरंत उस पर स्टे कर सकती है या खत्म कर सकती है।
चूंकि यूजीसी गाइडलाइंस मौलिक अधिकारों से टकरा रही है, इसी वजह से इस पर विवाद भी है. इसका दायरा बहुत संवेदनशील है. इसी वजह से इसके संवैधानिक होने पर सवाल उठाया जा रहा है।
सवाल - क्या ये कानून है जो संसद में बिल के रूप में पारित हुआ?
- नहीं। यह कोई संसद में पारित विधेयक या कानून नहीं है. यह UGC के अंतर्गत एक नियमन है. UGC के पास़ एक विनियम यानि रेगुलेशन जारी करने का अधिकार है जो UGC Act 1956 के तहत उच्च शिक्षा संस्थानों पर लागू होता है. इसलिए इसे क़ानून के तौर पर नहीं बल्कि नए UGC नियम समानता नियमन2026 (Equity Regulations 2026) के रूप में देखना चाहिए, जो संसद में पेश होकर पारित नहीं हुआ बल्कि UGC ने खुद अधिसूचित किया.
सवाल - क्या इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट में मामला दर्ज किया गया है?
- हां. इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट में पीआईएल दायर की गई है जिसमें कहा गया है कि नियम 3(C) यानि जातिगत भेदभाव की परिभाषा के तहत ये गाइडलाइंस असंवैधानिक है.
यूजीसी की गाइडलाइंस असंवैधानिक क्यों कही जा रही
सबसे बुनियादी आपत्ति ये है कि UGC ने "कानून" जैसा काम कर दिया. उसने इस नियमन के जरिए ऐसा ढांचा बना दिया जो नए अधिकार, नई परिभाषाएं और दंडात्मक प्रक्रिया तय करता है. आरोप लगाया जा रहा है कि ये विधायी शक्ति का अतिक्रमण है, ऐसा नियम बनाने का काम केवल संसद कर सकती है, अनुच्छेद 245-246 के तहत कानून बनाने का अधिकार संसद या विधानसभाओं को है. यूजीसी केवल केवल अधीनस्थ नियमन कर सकता है. मौलिक अधिकारों की नई व्याख्या नहीं कर सकता।
इस मामले में पीआईएल सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गई है. हालांकि यूजीसी का कहना है कि ये नए नियम सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर ही तैयार किये गये हैं. (फाइल फोटो)
क्या ये आर्टिकल 14 का उल्लंघन
सुप्रीमकोर्ट में दायर पीआईएल यही कहती है कि ये Article 14 का भी उल्लंघन है, जो समानता की बात करता है. भेदभाव की बात सभी नागरिकों के लिए समान रूप से परिभाषित होना चाहिए. केवल कुछ वर्गों को संरक्षित कैटेगरी बनाकर नहीं. लिहाजा इसे आर्टिकल 14 का उल्लंघन बताया जा रहा. भेदभाव का कानून जाति-निरपेक्ष होना चाहिए, जाति-विशेष नहीं.
क्यों आर्टिकल15 की गलत व्याख्या का आरोप
Article 15(4) और 15(5) राज्य को SC/ST/OBC के लिए विशेष प्रावधान करने की शक्ति देता है. ये अनुच्छेद सकारात्मक कार्रवाई (affirmative action) के लिए हैं. दंडात्मक नियम बनाने के लिए नहीं. आरोप लगाया जा रहा है कि UGC ने इन्हें गलत तरीके से विस्तारित कर दिया.
क्या इसे संंसद से पास होना चाहिए था
PIL में भी यही कहा गया है कि ये इतना संवेदनशील विषय है कि इसे संसद में बहस और विधेयक के ज़रिये आना चाहिए था ना कि एक रेगुलेटरी नोटिफिकेशन से.
PIL के जरिए सुप्रीम कोर्ट से क्या अनुरोध
- नए नियमन को अस्थायी रूप से स्थगित (stay) किया जाए
- ये घोषित किया जाए कि UGC ने अपनी वैधानिक सीमा लांघी
- अगर कानून बनाना है तो संसद से विधेयक लाया जाए
हालांकि यूजीसी और सरकार का पक्ष ये है कि यह नया कानून नहीं है बल्कि UGC Act 1956 के तहत पहले से SC/ST/OBC के छात्रों के साथ भेदभाव से निपटने का नियम है. ये नियम रोकथाम और शिकायत निवारण के लिए हैं. ये केवल संस्थागत सुधार का ढांचा है. हालांकि इस मामले ने अब एक बड़े विवाद का रूप ले लिया है।