मेरठ में सूरज प्रकाश की अंतिम यात्रा में मुस्लिमों ने भी दिया कंधा, हिंदू रीति-रिवाज से हुआ उनका अंतिम संस्कार.. वहीं मुस्लिमों ने फातिया पढ़ी...
यूपी, मेरठ। गंगा जमुनी तहजीब की एक मिसाल शहर के पुराने इलाके खंदक के नौगजा में देखने को मिली। जब इंसानियत मजहब से कहीं बढ़ कर दिखाई दी। इस मोहल्ले में 82 वर्षीय ज्ञानी सूरजप्रकाश उर्फ ज्ञानी जी का सोमवार को निधन हो गया। यह क्षेत्र हिंदू और मुस्लिम मिश्रित आबादी वाला क्षेत्र है।
अंतिम यात्रा में हिंदुओं के साथ मुसलमानों भी बढ़चढ़ कर न सिर्फ शामिल हुए बल्कि अर्थी को कंधा भी दिया। यही नहीं जब तक पूरी तरह चिता ठंडी होने तक वहीं मौजूद रहे। मकान में कमल भड़ाना डेयरी की दुकान चलाते हैं साथ ही उनकी देखरेख की जिम्मेदारी उठा रहे थे।
अकेले मकान में रहते थे सूरज प्रकाश
सूरज प्रकाश अकेले मकान में रहते थे। कुंज विहार निवासी कमल ही उनके खाने-पीने का प्रबंध करता था। पिछले कुछ समय से सूरज बीमार चल रहे था। कमल ने बताया कि रविवार की रात वह उनके लिए खाना लेकर आया था जिस पर उन्होंने कहा था कि उनका मन नहीं है फ्रिज में रख दो सुबह खा लूंगा।
हमेशा की तरह जब वह सुबह दुकान खोलने के बाद उनके पास गया तो भी उन्होंने खाना खाया नहीं था। कहने पर नाश्ते में केले खाए। थोड़ी देर बाद सुबह साढ़े नौ बजे जब वह फिर गया तो वह मृत मिले।
कमल ने बताया कि उनके 1970 में ताऊ किरन सिंह ने नरहाड़ा गांव से आ कर यहां डेरी आरंभ की थी। उस समय सूरजप्रकाश के बड़े भाई जगदीश भी थे। ताऊ जी के साथ उनके पिता प्रेम सिंह और अब वह डेयरी संचालित कर रहे हैं। बताया कि ताऊ जी के समय से ही परिवार उनकी देखरेख करता रहा है।
जगदीश का निधन तीन साल पहले हो गया जिसके बाद सूरज अकेले रह गए थे। रविवार को सूचना पर दिल्ली निवासी उनकी बहन कमला और भतीजी नीलम पहुंची। सूरजप्रकाश के मौत की सूचना मिलने पर आसपास के मोहल्ले के लोग एकत्र हो गए।
विक्की शर्मा ने बताया कि मोहल्लों के लोगों ने अर्थी और अंतिम संस्कार में प्रयोग होने वाले सामान का इंतजाम किया। जिसमें हिंदुओं के साथ मुसलमान भी अच्छी खासी संख्या में थे।
पड़ोसी 40 वर्षीय आसिफ ने बताया कि उन्हें हम गुरु जी कह कर बुलाते थे। बताया कि जब वह छोटे थे अक्सर टाफी और पतंग उड़ाने के पैसे दिया करते थे। यही हाल उनका आज के बच्चों के साथ था।
शादाब झब्बू ने बताया कि बच्चों से वह अक्सर हंसी मजाक करते रहते थे। पिछले दो तीन साल वह ज्यादा दूर चलने फिरने में असमर्थ तो अक्सर मोहल्ले वाले ही उनको खाना और नाश्ता दे दिया करते थे।
महत्वपूर्ण बात यह है कि इस समय रोजे चल रहे हैं इसके बावजूद इरशाद, जीशान, फरमान, अनीस मुनीम आदि लोग की अर्थी को बारी बारी से कंधा देते हुए सवा दो किलोमीटर दूर सूरजकुंड तक पैदल अंतिम यात्रा में शामिल हुए।
एक ओर राम नाम सत्य की गूंज थी तो मुसलमान दुआ करते हुए चल रहे थे। अर्थी के साथ खासी संख्या में मुसलमानों को देकर लोग अचरज से भरे नजर आए। अंतिम संस्कार कमल ने किया। कमल ने बताया कि उनका भतीजा संजय कंकरखेडा में रहता है वह काम के सिलसिले में बाहर होने के कारण नहीं आ पाया।