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अरे का हो गुरू! तोहार ध्यान किधर बा, ई २०२६ क होली हव कि २०२७ चुनावी ट्रेलर?' — बनारस के घाटो से सीधे ग्राउंड रिपोर्ट, पढ़ा न हो ई ला...

अरे का हो गुरू! तोहार ध्यान किधर बा, ई २०२६ क होली हव कि २०२७ चुनावी ट्रेलर?' — बनारस के घाटो से सीधे ग्राउंड रिपोर्ट, पढ़ा न हो ई ला...


बनारस (अस्सी घाट): २ मार्च २०२६ की सुबह है और अस्सी पर चाय की अड़ी जमी है। गंगा जी की लहरों से ज्यादा शोर इस बार राजनीति के 'पक्के रंग' का है। चिलम सुलगाते हुए एक चचा बोले— "अबे ! ये देखो भैय्ये, २०२७ का चुनाव अगले साल है, पर नेताओं ने पिचकारी में 'चुनावी बारूद' अभी से भर लिया है!"

१. 'महंगाई' की होलिका और 'तेल' का खेल

गुरू, इस बार तो होली का हाल ऐसा है कि आदमी गुझिया बनाने से पहले 'कैलकुलेटर' लेकर बैठ रहा है। मैदे का दाम रॉकेट है और रिफाइंड तेल तो ऐसे बिक रहा है जैसे गंगाजल हो— बूंद-बूंद की कीमत है भैय्या ! बनारसी मिजाज में कहें तो— "अबकी होलिका दहन में बुराई जले न जले, आम आदमी का बटुआ जरूर जल रहा बे।" २०२६ की ये होली महंगाई के उस 'पक्के रंग' जैसी है जो साबुन रगड़ने से भी नहीं छूट रही।


वाराणसी के दशाश्वमेध, अस्सीघाट, गायघाट, केदारघाट, नमोघाट की गलियों में घूमने वाले 'डिग्रीधारी' युवा इस बार रंग नहीं, अपने जीवन भर के मेहनत की 'रिज्यूमे' उड़ा रहे हैं। २०२६ की इस होली में युवा पूछ रहे हैं— "गुरू, पिछली होली पर जो रोजगार का वादा था, वो क्या भांग के साथ पी गए क्या?" २०२७ के चुनाव का गाजर दिखाकर २०२६ की होली काटी जा रही है।

"भैय्ये! यहाँ नौकरी तो ऐसी हो गई है जैसे होली के हुड़दंग में खोया हुआ चप्पल— मिलती सबको है, पर जोड़ी किसी की नहीं जमती!"


२०२६ की इस होली में नेताओं के चेहरे पर 'सफेद कुर्ता' भले हो, पर नीयत में २०२७ का 'सतरंगी' लालच है। कोई कह रहा है— "होली बाद गरीबी खत्म", तो कोई कह रहा है— "अगली होली तक हर हाथ में काम"। पर बनारसी जनता जानती है कि ये सब 'भांग का गोला' है, जो निगलने में तो मीठा है पर चढ़ने के बाद सिर्फ सपना दिखाता है।

२०२६ का मुद्दा जनता का बनारसी जवाब

गरीबी "अबे! फटे कुर्ते में रंग ज्यादा अच्छा खिलता है, यही समझ लो!"

मंहगाई "होली है भाई! अब गुझिया नहीं, सिर्फ 'गाली' मुफ्त है।"

२०२७ का चुनाव "अभी से कुर्ता सिलवा लिए हैं नेता जी, जैसे २०२६ तो बस बहाना है।"

तो गुरू, कुल मिलाकर बात यही है कि २०२६ की ये होली बस एक 'प्रैक्टिस मैच' है। असली धोबी-पछाड़ तो २०२७ में होगा। तब तक भांग छानिये, 'हर हर महादेव' कहिये और मंहगाई के रंग में सराबोर रहिये। क्योंकि बनारस है भाई, यहाँ अभाव में भी 'भाव' कम नहीं होता!

अंत में चलते चलते,, बोला गुरु... सरा-ररा... सरा-ररा... होली हव भाई होली हव, बुरा ना मानो होली हव...।

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Happy Holi Wishes All You 
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