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LPG संकट के बीच लौटा चूल्हा: बिहार में 'गोइठा इकोनॉमी' बनी मजबूरी की नई ताकत...

LPG संकट के बीच लौटा चूल्हा: बिहार में 'गोइठा इकोनॉमी' बनी मजबूरी की नई ताकत...

डिजिटल डेस्क, पटना बिहार। पश्चिम एशिया में अस्थिरता और पेट्रोलियम आपूर्ति पर असर का सीधा असर अब बिहार की रसोई तक पहुंच गया है। LPG सिलेंडर की किल्लत ने आम परिवारों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। कई घरों में गैस चूल्हा ठंडा पड़ चुका है। वहीं, मिट्टी के चूल्हे और धुआं उगलते उपले फिर से सक्रिय हो गए हैं।

जो गोइठा कभी बीते दौर की चीज माना जाता था, अब जरूरत बन गया है। यह बदलाव महज ईंधन का नहीं, बल्कि जीवनशैली का संकेत दे रहा है।

गोइठा बना नया सहारा, बढ़ी कीमत

LPG की कमी ने अचानक गोइठा के बाजार को फिर से जिंदा कर दिया है। पहले सर्दियों तक सीमित रहने वाला यह ईंधन अब गर्मियों में भी बिक रहा है।

मांग बढ़ने के साथ कीमतों में भी उछाल आया है। जो गोइठा पहले ₹1 में मिलता था, अब ₹2 प्रति पीस बिक रहा है।

छोटे दुकानदारों से लेकर ठेले वाले तक इसकी खरीद कर रहे हैं। इस तेजी ने 'गोइठा इकोनॉमी' को जन्म दे दिया है।

10 दिनों में बदली बाजार की चाल

पटना के कई इलाकों में पिछले 10-15 दिनों में हालात तेजी से बदले हैं। पहले जहां दिनभर में गिने-चुने ग्राहक आते थे, अब लाइन लग रही है।

सुबह से शाम तक गोइठा खरीदने वालों की भीड़ देखी जा रही है। विक्रेताओं के लिए यह अचानक बढ़ी मांग अवसर बन गई है।

लेकिन उपभोक्ताओं के लिए यह मजबूरी है। गैस की अनुपलब्धता ने लोगों को विकल्प तलाशने पर मजबूर कर दिया है।

घर-घर लौटा मिट्टी का चूल्हा

राजीव नगर की सुनीता की कहानी इस संकट की सच्चाई दिखाती है। गैस खत्म होने के बाद उन्हें नया सिलेंडर नहीं मिला।

ब्लैक मार्केट में महंगे दाम सुनकर उन्होंने हार मान ली। अब ₹500 का गोइठा खरीदकर चूल्हे पर खाना बना रही हैं।

वे बताती हैं कि चूल्हे पर खाना बनाना कठिन है। इसलिए अब सुबह-शाम ही खाना पकाया जा रहा है।

गर्मी में भी तेज हुई बिक्री

गोइठा बनाने वाली कहती हैं कि पहले गर्मियों में बिक्री ठप हो जाती थी। लेकिन इस बार हालात पूरी तरह उलट हैं। ठंड से ज्यादा बिक्री अब गर्मी में हो रही है।

डिमांड इतनी ज्यादा है कि उत्पादन बढ़ाना पड़ रहा है। यह बदलाव बाजार की दिशा बदलने जैसा है। कम समय में एक नया आर्थिक चक्र बन गया है।

बढ़ती मांग ने बढ़ाई चुनौतियां

विक्रेता छोटे लाल बताते हैं कि मांग पूरी करना अब मुश्किल हो रहा है। उनके पास खुद का खटाल है, फिर भी गोबर बाहर से खरीदना पड़ रहा है।

आपूर्ति और मांग के बीच संतुलन बिगड़ गया है। एक ओर लोगों की मजबूरी है, दूसरी ओर बाजार का दबाव।

अगर गैस संकट लंबा चला, तो यह स्थिति और गंभीर हो सकती है। फिलहाल, बिहार में चूल्हे की लौ ही लोगों का सहारा बनी हुई है।