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बड़ो मां का वो मंदिर जहां पीएम मोदी ने टेका माथा, इसके बिना बंगाल फतह मुश्किल, ममता भी लगाए बैठीं हैं आस...

बड़ो मां का वो मंदिर जहां पीएम मोदी ने टेका माथा, इसके बिना बंगाल फतह मुश्किल, ममता भी लगाए बैठीं हैं आस...

बंगाल न्यूज। शरणार्थी होने का दर्द, नागरिकता की आस और सत्ता के सिंहासन का रास्ता। पश्चिम बंगाल की सियासत का यह वह त्रिकोण है जिसके केंद्र में आज फिर ठाकुरबाड़ी खड़ा है। जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मतुआ समुदाय के सबसे पवित्र मंदिर में कदम रखा तो यह केवल एक धार्मिक यात्रा नहीं थी बल्कि करोड़ों 'नमोशूद्र' दिलों की धड़कन को छूने की एक गहरी राजनीतिक गूंज थी। विभाजन की लकीरों ने जिस समुदाय को जड़ों से उखाड़ा, आज वही समुदाय बंगाल के चुनावी मानचित्र पर अपनी ताकत की नई इबारत लिख रहा है। 

बड़ो मां की स्मृतियां, CAA की दहलीज पर खड़ी उम्मीदें और हरिचांद-गुरुचांद ठाकुर के आदर्शों की कसम-प्रधानमंत्री का यह 'स्पेशल कनेक्ट' बंगाल की हवाओं में फिर से एक बड़े सियासी बदलाव की सुगबुगाहट पैदा कर रहा है। यह महज एक मंदिर दर्शन नहीं बल्कि मतुआओं की अस्मिता और पहचान के उस लंबे संघर्ष को नमन है जो अब बंगाल की सत्ता का भाग्यविधाता बन चुका है।

पश्चिम बंगाल की राजनीति में मतुआ समुदाय (Matua Community) केवल एक धार्मिक संप्रदाय नहीं बल्कि एक निर्णायक किंगमेकर की भूमिका निभाता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ठाकुरनगर की हालिया यात्रा ने एक बार फिर इस समुदाय के राजनीतिक और सामाजिक महत्व को चर्चा में ला दिया है।

मतुआ मंदिर: भक्ति और शक्ति का केंद्र

ठाकुरनगर स्थित श्रीधाम ठाकुरबाड़ी मतुआ समुदाय का सबसे पवित्र तीर्थ स्थल है। इसकी स्थापना समाज सुधारक हरिचांद ठाकुर के वंशज प्रमथ रंजन ठाकुर ने भारत विभाजन के बाद की थी। यह मंदिर केवल पूजा-पाठ का स्थान नहीं है बल्कि विभाजन का दंश झेलकर आए लाखों नमोशूद्र हिंदुओं की अस्मिता और पहचान का प्रतीक है। हरिचांद ठाकुर ने 19वीं सदी में अविभाजित बंगाल के ओराकांडी (वर्तमान बांग्लादेश) में इस संप्रदाय की नींव रखी थी जिसका मुख्य उद्देश्य जातिगत भेदभाव को मिटाना और शिक्षा के माध्यम से दलितों का उत्थान करना था।

2019 की यात्रा और 'बड़ो मां' का आशीर्वाद

प्रधानमंत्री मोदी और बड़ो मां (बीनापाणी देवी) की 2019 की मुलाकात ने बंगाल की राजनीति में एक नया मोड़ दिया था। उस समय पीएम मोदी ने उनके पैर छूकर आशीर्वाद लिया था जिसकी तस्वीर आज भी मतुआ वोटर्स के बीच काफी लोकप्रिय है।

· राजनीतिक असर: इस मुलाकात और उसके बाद CAA (नागरिकता संशोधन कानून) के वादे ने मतुआ समुदाय को बड़े पैमाने पर बीजेपी की ओर मोड़ दिया।

· नतीजा: 2019 के लोकसभा चुनाव में मतुआ बहुल उत्तर 24 परगना और नदिया जिलों की कई सीटों पर बीजेपी ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की।

बंगाल की सियासत में इतिहास और प्रभाव
मतुआ समुदाय का बंगाल की राजनीति में दखल साल-दर-साल गहरा होता गया है।

1. वोट बैंक की ताकत: पश्चिम बंगाल में मतुआ समुदाय की आबादी लगभग 1.5 करोड़ से 2 करोड़ के बीच मानी जाती है। राज्य की लगभग 30 से 40 विधानसभा सीटों पर यह समुदाय हार-जीत तय करने की ताकत रखता है।

2. बीजेपी की पकड़: 2019 के बाद से बीजेपी ने मतुआ समुदाय को नागरिकता दिलाने के मुद्दे (CAA) के जरिए अपनी पकड़ मजबूत की है। हालांकि, टीएमसी (TMC) भी इस गढ़ में सेंध लगाने के लिए 'मतुआ विकास बोर्ड' और सरकारी कल्याणकारी योजनाओं का सहारा ले रही है।

3. ठाकुर परिवार का बंटवारा: राजनीति ने मतुआ समुदाय के केंद्र 'ठाकुर परिवार' को भी दो हिस्सों में बांट दिया है। परिवार का एक धड़ा (शांतनु ठाकुर) बीजेपी के साथ है, तो दूसरा धड़ा (ममता बाला ठाकुर) तृणमूल कांग्रेस का प्रतिनिधित्व करता है।