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बिहार की सत्ता के केंद्र में बिजेंद्र यादव की एंट्री के क्या मायने? NDA सरकार में पहले कभी नहीं हुआ ऐसा, जानिए पूरा डिटेल में...

बिहार की सत्ता के केंद्र में बिजेंद्र यादव की एंट्री के क्या मायने? NDA सरकार में पहले कभी नहीं हुआ ऐसा, जानिए पूरा डिटेल में...

भारतीय जनता पार्टी के नेता सम्राट चौधरी ने बुधवार को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। उनके साथ ही विजय कुमार चौधरी और बिजेंद्र प्रसाद यादव ने भी उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ली। राज्य की सत्ता के केंद्र में यादव चेहरे की एंट्री से राज्य में अटकलों का दौर शुरू हो गया है। विजय कुमार चौधरी के बीजेपी नेता विजय सिन्हा का रिप्लेसमेंट माना जा रहा है। बिजेंद्र की एंट्री ने लोगों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या बीजेपी राज्य में नई राजनीतिक समीकरण पर काम कर रही है।

कौन हैं बिजेंद्र यादव?

बिजेंद्र यादव सन 1990 से राजनीति में सक्रिय रहे हैं। मिथिलांचल क्षेत्र के सुपौल जिले में उनकी पकड़ लगातार मजबूत रही है। उन्होंने आठ बार विधानसभा चुनाव लड़ा है और विजयी रहे हैं। जनता दल से राजनीति की शुरुआत करने के बाद वो जेडीयू में शामिल हो गए। साल 2005 में नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री बनने के बाद वो लगभग हर सरकार में मंत्री रहे। बिहार की राजनीति में उनकी पहचान एक काफी अनुभवी नेता के तौर है। नीतीश कुमार उन्हें अपना अभिभावक मानते हैं।

जानकारी अनुसार वे लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुनार दोनों के करीबी रहे हैं। लालू यादव ने भी उन्हें 1991 ऊर्जा राज्य मंत्री का जिम्मा दिया था। जबकि राजग सरकार ने बिजेंद्र को वित्त, ऊर्जा, योजना एवं विकास , खाद्य एवं उपभोक्ता संरक्षण समेत कई अहम विभाग की जिम्मेदारी सौंप चुकी है। उनकी छवि एक साफ सुथरे नेता की है। वो विवादों में नहीं रहे हैं।

बिजेंद्र यादव की एंट्री के क्या मायने?

यादव समुदाय से आने वाले बिजेंद्र प्रसाद की एंट्री इसलिए मायने रखती है, क्योंकि पहले कभी ऐसा नहीं हुआ। राज्य में जब भी NDA की सरकार आई है, तब सत्ता के केंद्र में यादव की एंट्री नहीं हो पाई। भले ही उन्हें अहम मंत्रालय की जिम्मेदारी सौंपी गई हो। लेकिन उपमुख्यमंत्री का पद उनके लिए सपना ही रहा। इस बात को विपक्ष खूब भुनाता रहा है।

हालांकि, अब पहली बार बिहार की राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार ने सत्ता के केंद्र में एक यादव फेस को मौका दिया है। बिहार की सत्ता का ये नया मॉडल, एक काफी सोचे-समझे और सधे तरीके से लिए गए फैसले का नतीजा है। मख्यमंत्री सम्राट चौधरी कोइरी समाज से आते हैं। यह नीतीश कुमार के पुराने लव-कुश (कुर्मी-कोइरी) गठबंधन का हिस्सा है।

1990 के दशक से ही नीतीश इस सामाजिक गुट पर भरोसा करते रहे हैं। लालू यादव के मुस्लिम-यादव मॉडल के विकल्प के तौर पर नीतीश ने अपनी राजनीति लव-कुश मॉडल पर खड़ी की थी। जबकि उपमुख्यमंत्री विजय कुमार चौधरी भूमिहार समाज से आते हैं। चूंकि राजनीति में जातीय समीकरण काफी मायने रखते हैं, ऐसे में इस तिकड़ी का राजनीतिक महत्व काफी बढ़ जाता है।

सत्ता के केंद्र में अगड़ी और पिछड़ी जातियों के नेता को एक साथ मौका देने के पीछे सरकार की दूरदर्शिता स्पष्ट नजर आती है। आमतौर पर बिहार में अगड़ी जातियों और बनिया को भाजपा का मूल वोटर माना जाता है। जबकि कोइरी, कुर्मी, कुशवाहा और अति पिछड़ा वर्ग (EBC) को जनता दल यूनाइटेड का वोटर्स माना जाता है। इसके अलावा, नीतीश सरकार की नीतियों (जैसे- महिला आरक्षण, साइकिल योजना, शराबबंदी) के कारण महिला मतदाता भी पार्टी का एक बड़ा और स्थिर वोट बैंक मानी जाती हैं।

राज्य में यादवों और मुसलमानों को राष्ट्रीय जनता दल के ट्रेडिशनल वोटरों के तौर पर देखा जाता है। इसी कारण पार्टी को MY (मुस्लिम-यादव) की पार्टी भी कहा जाता है। कुछ प्रतिशत दलित भी आरजेडी के पक्ष में मतदान करते रहे हैं। वो लालू यादव ‘गरीबों के मसीहा’ के तौर पर देखने हैं। हालांकि, अब इन मतादाताओं को साधने के लिए मौजूदा सरकार ने अहम दांव चला है।

कोइरी, भूमिहार और यादव की तिकड़ी से बड़े स्तर पर मतदाताओं के शिफ्ट होने की उम्मीद है। इस फैसले से राज्य के यादवों के बीच एक सशक्त मैसेज पहुंची है। राज्य की सत्ता के केंद्र में इन तीन जातियों के नेता को लाकर पुराने सभी समीकरणों को बदल दिया गया है। यह इसलिए भी चौंकाने वाला है क्योंकि बिहार में भूमिहार और यादवों के बीच एक कसक रही है। इसे झुठलाया नहीं जा सकता। कई घटनाएं इस ओर इशारा करती है।

हालांकि, इस फैसले से अब पुराने सभी समीकरणों के बदलने के आसार हैं। साथ ही एक बात यह भी साफ है कि नीतीश कुमार ने भले ही मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया है, लेकिन राज्य की राजनीति अब भी उनकी ही पार्टी के इर्द-गिर्द घूमती है। बीजेपी का इस तिकड़ी पर हामी भरना भी काफी अहम है। शीर्ष पद के सवर्ण चेहरा पुराने वोटबैंक को मजबूती देती है। जबकि यादव फैक्टर आरजेडी की वोटबैंक पर चोट करती है। इससे आरजेडी की यह तर्क भी गलत साबित होती है कि केवल वो ही यादवों की अपनी पार्टी है।

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नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने सोमवार (6 अप्रैल,2026) को नवादा का दौरा किया। वे झारखंड से लौटते समय पूर्व राज्य मंत्री और राष्ट्रीय जनता दल के नेता राजबल्लभ प्रसाद यादव के पथरा इंग्लिश स्थित आवास पर पहुंचे। यहां उन्होंने राजबल्लभ और जनता दल यूनाइटेड से विधायक विभा देवी के बेटे अखिलेश कुमार के असामयिक निधन पर शोक संतप्त परिवार से मुलाकात कर संवेदना व्यक्त की।