पीएम मोदी न्यूज (लेख)
पूर्व पीएम मनमोहन सिंह खत्म न करते ये कानून, तो आज पीएम मोदी को सोना खरीदने से रोकना आम पब्लिक को नहीं कहना पड़ता...
पीएम मोदी की अपील।(वरिष्ठ पत्रकार,ए.के. केसरी)। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कह रहे कि एक साल तक गोल्ड मत खरीदो. कई तरह के जतन कर रहे हैं ताकि बाहर का सोना भारत न आए. टैक्स पर टैक्स लगाए जा रहे हैं, लोगों को जागरूक किया जा रहा है। लेकिन इन सब की कोई जरूरत नहीं पड़ती अगर मनमोहन सिंह ने 1990 में सोने से जुड़ा पुराना कानून खत्म न किया होता है. क्योंकि तब ऐसी ऐसी पाबंदियां थीं कि लोग सोना अपने घरों में जमा ही नहीं कर सकते थे. बकायदा लिमिट तय थी. तो ऐसा हुआ क्या?
क्यों मनमोहन सिंह को यह कानून ही रद्द करना पड़ा?
बात 1968 की है. तब सरकार ने कहा था- लोग बहुत सोना खरीद रहे हैं, देश का डॉलर जा रहा है, अर्थव्यवस्था डूब जाएगी. लेकिन 1990 आते-आते सरकार ने मान लिया, जितना सोना रोकने की कोशिश की, उतनी ही तस्करी बढ़ गई. और अब 2026 में फिर वही बहस लौट आई है. फर्क बस इतना है कि इस बार गोल्ड कंट्रोल एक्ट नहीं है, लेकिन सोने के आयात पर ड्यूटी, महंगा गोल्ड और बढ़ती तस्करी पर सरकार की चिंता फिर सामने है।
जब सरकार ने कहा- इतना सोना मत रखो
शुरुआत होती है 1960 के दशक से. तब भारत गरीब देश था. विदेशी मुद्रा भंडार कमजोर था. दूसरी तरफ भारतीय समाज में सोना सिर्फ गहना नहीं था- सुरक्षा था, बचत था, इज्जत था. शादी से लेकर संकट तक, हर जगह सोना काम आता था. सरकार को लगा कि देश का बहुत पैसा सोना खरीदने में जा रहा है. तब इंदिरा गांधी की सरकार ने 1968 में गोल्ड कंट्रोल एक्ट लागू कर दिया।
क्या था कानून में प्रावधान
* बिना लाइसेंस के सोना रखना, बेचना, खरीदना या व्यापार करना गैरकानूनी हो गया।
* जेवर बनाने वालों के लिए भी लाइसेंस जरूरी हो गया. गोल्ड बार और सिक्कों पर सख्ती कर दी गई।
* गोल्ड रखने की लिमिट तय कर दी गई. विवाहित महिला सिर्फ 500 ग्राम सोना रख सकती थी।
* अविवाहित महिला को 250 ग्राम सोना रखने की छूट थी. पुरुष 100 ग्राम रख सकते थे।
* सोने की तस्करी और अवैध व्यापार पर जेल भेजने का प्रावधान कर दिया गया।
* लेकिन दिल्ली में बैठे अफसर एक बात समझ नहीं पाए कि भारत में सोना इमोशन है. यहां लोग बैंक पर शक कर सकते हैं, लेकिन सोने पर नहीं. यहीं से सारा खेल बिगड़ गया. डिमांड कम नहीं हुई और सोने की तस्करी बढ़ गई।
कानून आते ही तस्करों का स्वर्णकाल
सरकार सोच रही थी कि लोग सोना खरीदना कम कर देंगे. लेकिन हुआ उल्टा. डिमांड वही रही, लेकिन बाजार अंडरग्राउंड हो गया. दुबई से सोना आने लगा. समुद्री रास्तों से तस्करी बढ़ी. मुंबई का अंडरवर्ल्ड गोल्ड रूट पर मजबूत होता गया. उधर कानून इतना सख्त था कि छोटे सुनार तक परेशान हो गए. जौहरी कहते थे कि ग्राहक सोना मांग रहा है, लेकिन सरकार ऐसे ट्रीट कर रही जैसे हम अपराधी हों. नतीजा? काला बाजारी बढ़ गई. तस्करी बढ़ गई. सरकार का कंट्रोल घट गया. यानी जिस बीमारी की दवा बनाई गई थी, वही बीमारी और फैल गई।
फिर आए नरसिम्हा राव और मनमोहन सिंह
* 1991 का दौर… भारत आर्थिक संकट में फंस चुका था. विदेशी मुद्रा इतनी कम थी कि कहा जाता है देश कुछ हफ्तों का आयात ही कर सकता था. तब नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री और मनमोहन सिंह वित्त मंत्री बने. यहीं से भारत ने लाइसेंस राज से बाहर निकलना शुरू किया. सरकार ने समझा कि हर चीज पर ताला लगाने से अर्थव्यवस्था नहीं चलती.इसके बाद गोल्ड कंट्रोल एक्ट 1968 खत्म कर दिया गया.
* ग्लोबलाइजेशन की वजह से सरकार को उस वक्त तमाम कानून खत्म करने पड़े. तमाम तरह के प्रतिबंध हटाने पड़े ताकि दुनिया का माल भारत में आ सके. भारत का सामान दुनिया में जा सके. इसी वजह से गोल्ड इंपोर्ट पर लगी पाबंदियां भी हटाई गईं. इसके बाद धीरे-धीरे गोल्ड आयात आसान हुआ. बाजार खुला. बड़े ज्वेलरी ब्रांड आए.
* सरकार का लॉजिक था कि अगर लोग सोना खरीदना बंद नहीं करेंगे, तो कम से कम इसे लीगल तरीके से खरीदने दो. सच यही है कि एक्ट हटने के बाद गोल्ड ट्रेड ज्यादा ऑर्गनाईज हुआ. लेकिन इसके बाद एक नई समस्या आ गई. डिमांड बढ़ने के साथ ही भारत का गोल्ड इम्पोर्ट लगातार बढ़ता चला गया।
मोदी सरकार की दुविधा- गोल्ड चाहिए भी, नहीं भी
* आज भारत दुनिया के सबसे बड़े गोल्ड उपभोक्ताओं में है. हर साल भारी मात्रा में सोना आयात होता है. लेकिन सोना खरीदने में डॉलर खर्च होता है. जब लोग ज्यादा सोना खरीदते हैं, तो आयात बिल बढ़ता है, चालू खाता घाटा बढ़ता है. रुपए पर दबाव आता है. यानी सरकार की चिंता आज भी वही है जो 1968 में थी।
* फर्क सिर्फ तरीके का है. अब सरकार सोना खरीदने पर रोक नहीं लगा सकती.तो इम्पोर्ट ड्यूटी बढ़ाती है. गोल्ड बॉन्ड स्कीम लाती है. डिजिटल गोल्ड और ETF को बढ़ावा देती है. लोगों को बैंकिंग निवेश की तरफ धकेलती है. यानी कंट्रोल एक्ट नहीं है, लेकिन कंट्रोल की कोशिश आज भी जारी है।
* प्रधानमंत्री की एक साल सोना न खरीदने की अपील भी इसी का हिस्सा है. ग्लोबलाइजेशन की वजह से सरकार गोल्ड इंपोर्ट पर सीधे बैन लगा सकती. लेकिन प्रधानमंत्री मोदी लोगों से सोना न खरीदने की अपील तो कर ही सकते हैं. लोग सोना नहीं खरीदेंगे तो सरकार पर दबाव कम होगा. सोना इंपोर्ट करने में जो विदेशी मुद्रा भंडार खर्च होता है, वह बचेगा।
अगर गोल्ड कंट्रोल एक्ट खत्म न होता तो?
* अगर मनमोहन सिंह उस दौर में गोल्ड कंट्रोल एक्ट खत्म नहीं करते, तो शायद आज भी गोल्ड बार रखना मुश्किल होता. जौहरी लाइसेंस राज में फंसे रहते. तस्करी और ज्यादा होती. दुबई गोल्ड रूट और बड़ा बन जाता।
* भारत का गोल्ड मार्केट कभी ऑर्गनाइज्ड नहीं हो पाता.और शायद आज सरकार को इम्पोर्ट ड्यूटी बढ़ाने की जरूरत भी कम पड़ती, क्योंकि लीगल मार्केट छोटा होता।
* लेकिन दूसरी तरफ ये भी सच है कि लोगों की सोने की मांग खत्म नहीं होती. अवैध बाजार और बड़ा हो सकता था. सरकार को टैक्स भी कम मिलता. यानी गोल्ड कंट्रोल एक्ट जारी रहता तो भारत शायद सस्ता सोना नहीं, बल्कि छुपा हुआ सोना वाला देश बन जाता।
* भारत में सोना सिर्फ मेटल नहीं, मानसिकता है. यहां लोग शेयर बाजार गिरने पर डरते हैं, लेकिन सोना खरीदकर सुरक्षित महसूस करते हैं. शादी में बैंक FD नहीं दिखाई जाती, सोना दिखाया जाता है।
* सरकारें बदलती रहीं. इंदिरा गांधी ने कंट्रोल लगाया. मनमोहन सिंह ने कंट्रोल हटाया. और अब पीएम मोदी की सरकार टैक्स और नई स्कीमों के जरिए लोगों की गोल्ड आदत बदलने की कोशिश कर रही है।
लेख सांकलन, प्रसारित :: केसरी न्यूज 24 ।।