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इस मुस्लिम नवाब की हनुमान भक्ति से शुरू हुई थी बड़े मंगल पर भंडारे की प्रथा, 200 साल से आज भी बरकरार है यह परंपरा...

इस मुस्लिम नवाब की हनुमान भक्ति से शुरू हुई थी बड़े मंगल पर भंडारे की प्रथा, 200 साल से आज भी बरकरार है यह परंपरा...

धर्म आस्था डेस्क। लखनऊ में ज्येष्ठ मास के बड़े मंगल का आगाज़ होते ही पूरा शहर श्रद्धा और सेवा के रंग में डूब जाता है। सड़कों के किनारे, मोड़ों पर और हर छोटी गली में विशाल भंडारे सजने लगते हैं, जहां पूड़ी-सब्जी और ठंडे शरबत का वितरण होता है।लखनऊ में इन भंडारों की संख्या हज़ारों-लाखों तक पहुंच जाती है, जो इस शहर की एक अनूठी पहचान बन चुकी है।

लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर लखनऊ इन भंडारों का इतना बड़ा गढ़ क्यों बना? इसके पीछे की कहानी किसी चमत्कार से कम नहीं है। आखिर कैसे एक मुस्लिम नवाब की हनुमान भक्ति ने इस ऐतिहासिक परंपरा की नींव रखी, यह जानकर आप हैरान रह जाएंगे।

क्या है 'बड़ा मंगल'?

जेठ के तपते मंगलवारों में जब पूरा लखनऊ भंडारों और शरबत के प्याऊ से सज जाता है, तो उसे 'बड़ा मंगल' कहते हैं। यहां हर धर्म का व्यक्ति श्रद्धा से प्रसाद पाता है। पर इस महान परंपरा की नींव एक शाही मन्नत और साक्षात चमत्कार पर टिकी है।

क्या आप जानते हैं लखनऊ का विश्व प्रसिद्ध 'बड़ा मंगल' एक मुस्लिम शासक की देन है? आज के दौर में यह सच आपको हैरान कर सकता है, लेकिन इतिहास के पन्नों में यह सुनहरे अक्षरों में दर्ज है।

बेगम आलिया की मन्नत और साक्षात चमत्कार

अवध के नवाब मोहम्मद अली शाह की बेगम आलिया की कोई संतान नहीं थी। उन्होंने कई जगह दुआएं मांगी, फिर किसी के कहने पर पुराने अलीगंज हनुमान मंदिर में मन्नत मांगी। उनकी श्रद्धा ऐसी थी कि उन्होंने बजरंगबली को ही अपना अंतिम सहारा और रक्षक मान लिया।

हनुमान जी के आशीर्वाद से बेगम की गोद भर गई और नवाब के शाही महल में पुत्र रत्न की किलकारी गूंजी। इस असीम खुशी में नवाब और बेगम ने मंदिर का भव्य जीर्णोद्धार कराया। यह केवल एक निर्माण नहीं था, बल्कि बजरंगबली के प्रति उनका अटूट आभार और प्रेम था।

पहला शाही भंडारा और 'बड़ा मंगल' का नाम

पुत्र प्राप्ति के बाद जेठ के पहले मंगलवार को बेगम ने पूरे शहर के लिए शाही दावत का इंतजाम किया। शाही रसोइयों ने कड़ाहों में पूरियां तलीं और हलवा बांटा। यही लखनऊ का वह पहला 'भंडारा' था, जिसकी भक्ति और स्वाद की खुशबू आज 200 साल बाद भी शहर की फिजाओं में कायम है।

चूंकि यह विशाल आयोजन शाही परिवार और नवाबों द्वारा बहुत बड़े स्तर पर आयोजित किया गया था, इसलिए लोग इसे 'बड़ा मंगल' कहने लगे। धीरे-धीरे यह शाही परंपरा नवाबों के महल की चारदीवारी से निकलकर आम जनता के दिलों और शहर की हर छोटी-बड़ी गली तक पहुँच गई।

मंदिर पर चांद-तारा और एकता का पैगाम

नवाब की भक्ति का सबसे बड़ा सबूत आज भी अलीगंज मंदिर के शिखर पर साफ़ दिखता है। बेगम ने गुंबद पर 'चांद-तारा' का निशान लगवाया था। यह आज भी दुनिया के सामने सांप्रदायिक सौहार्द और लखनऊ की गौरवशाली गंगा-जमुनी तहजीब की सबसे बड़ी गवाही के रूप में शान से चमक रहा है। आज भी लखनऊ के भंडारों में हिंदू-मुसलमान मिलकर सेवा करते हैं।

यह कहानी हमें सिखाती है कि सच्ची सेवा और आस्था का कोई मजहब नहीं होता। इस ऐतिहासिक जानकारी को जरूर शेयर करें ताकि दुनिया हमारे देश की असली एकता और इस खूबसूरत इतिहास को करीब से पहचान सके।