मुंबई में दर्जी की दुकान चलाने वाले ने कैसे बनाई 78000 करोड़ की कंपनी, बच्चों से लेकर पीएम मोदी तक हैं प्रोडक्ट के मुरीद...जानें डिटेल में...
Success Story : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले दिनों यूरोपीय देश रोम में इटली की प्रधानमंत्री को एक टॉफी का पैकेट गिफ्ट किया था। इसके बाद देशभर में पारले कंपनी की इस टॉफी की चर्चा शुरू हो गई। पारले के प्रोडक्ट तो आज घर-घर में इस्तेमाल होते हैं, लेकिन क्या आपको पता है कि इस कंपनी को शुरू करने वाले हाथ कभी कपड़े सिलते थे। मुंबई के विले पार्ले में एक छोटी दर्जी की दुकान चलाने वाले मोहनलाल ने कैसे आज 78 हजार करोड़ का विशाल अम्पायर खड़ा किया। आज भले ही पीएम मोदी के गिफ्ट देने के बाद इस कंपनी की मेलोडी टॉफी की चर्चा देश-दुनिया में हो रही है, लेकिन इसकी नींव रखने वाले के बारे में शायद ही आपको पता होगा। आइए हम आपको बताते हैं...।
पारले कंपनी की शुरुआत से पहले इसके फाउंडर के बारे में जानते हैं. करीब 100 साल पहले मुंबई के विले पार्ले इलाके में मोहनलाल दयाल चौहान एक छोटी सी टेलर की दुकान चलाते थे. परिवार का पेट पालने के लिए उन्हें इस दुकान से छोटी मोटी कमाई होती थी. शुरुआत में तो सब ठीक था, लेकिन जब गारमेंट बिनजेस ने मुंबई में कदम रखा तो दर्जी को काम मिलना बंद हो गया. आलम ये हो गया कि मोहनलाल को इस काम से परिवार का पेट पालना भी मुश्किल हो रहा था. तब उन्होंने टेलरिंग का काम छोड़कर खाने-पीने की चीजों की तरफ रुख किया।
बेकरी से हुई थी पारले की शुरुआत
मोहनलाल ने सबसे पहले एक छोटी सी बेकरी खोली और ब्रेड, स्नैक्स और नानखटाई बेचनी शुरू की. यह वह दौर था जब मुंबई के कामकाजी परिवारों के बीच हाथ से बने बेकरी प्रोडक्ट की डिमांड बढ़ रही थी. सस्ती और स्वादिस्ट होने के नाते लोग इन प्रोडक्ट से जल्दी जुड़ जाते थे. उन्होंने जो काम सिर्फ परिवार पालने के लिए शुरू किया था, वह जल्द ही एक बढ़ते कारोबारी अवसर में बदल गया. समय के साथ मोहनलाल की बेकरी में बिस्कुट और कन्फेक्शनरी प्रोडक्ट तैयार होने लगे. अब उनकी बेकरी एक बड़ी कंपनी बनने के लिए पूरी तरह तैयार हो चुकी थी।
97 साल पहले शुरू हुई थी पारले कंपनी
मोहनलाल ने इस कंपनी का नाम पारले इसलिए रखा, क्योंकि इसकी नींव विले पार्ले से पड़ी थी. साल 1929 में चौहान परिवार पारले प्रोडक्ट की नींव रखी. तब मोहनलाल ने जर्मनी से 60 हजार रुपये में बिस्कुट बनाने वाली मशीन मंगाई, जिसे उस दौर में एक बड़ा कदम माना जाता था. इसके बाद आपने 5 बेटों मानेकलाल, पीतांबर, नरोत्तम, कांतिलाल और जयंतीलाल के साथ उन्होंने विले पार्ले में ही एक छोटी सी फैक्ट्री लगाई. बस यही से हो गई पारले की शुरुआत, जिसके स्वाद के मुरीद आज पूरी दुनिया में हैं।
तब अमीरों का प्रोडक्ट था बिस्कुट
पारले ने ऐसे समय में बिस्कुट बनाना शुरू किया था, जब देश में ज्यादातर बिस्कुट आयात किया जाता था और इसे अमीरों का प्रोडक्ट माना जाता था. तब देश में बिस्कुट सिर्फ अंग्रेज अधिकारी और अमीर भारतीय ही खाते थे. भारत में बने बिस्कुट बहुत कम ही बिकते थे, लेकिन पारले ने सस्ते प्रोडक्ट के जरिये जल्द ही बाजार को अपनी मुट्ठी में कर लिया. पारले का प्रोडक्ट घर-घर बिकने लगा और कंपनी का रेवेन्यू भी लगातार बढ़ना शुरू हो गया।
दूसरे विश्व युद्ध ने पलट दी बाजी
साल 1939 में दूसरे विश्व युद्ध ने बाजी पलट दी और पारले ने ग्रोथ की रफ्तार पकड़ ली. कंपनी ने तब पहली बार ग्लूकोज बिस्कुट बनाना शुरू किया. साथ ही कंपनी ने दूसरे विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश सेना को बिस्कुट सप्लाई करने का लाइसेंस भी प्राप्त कर लिया. इस कदम ने कंपनी को अपना उत्पादन बढ़ाने और बिजनेस ग्रोथ करने में काफी मदद की. इसके बाद तो पारले ने कदम नहीं रोके और धीरे-धीरे देश के घर-घर में अपने प्रोडक्ट पहुंचा दिए. आजादी के बाद साल 1947 में पारले एकमात्र ऐसी कंपनी बन गई जो विदेशी बिस्कुट को भी टक्कर देने लगा।
1960 में कंपनी ने बदल दिया बाजार
कंपनी ने साल 1960 में पारले ग्लूको नाम से एक प्रोडक्ट निकाला, जिसका नाम रखा Parle-G, जिसमें जी का मतलब ग्लूकोज है. एक दशक के भीतर पारले-जी बिस्कुट से बढ़कर हर घर की जरूरत बन गया. यह प्रोडक्ट हर भारतीय के जीवन का हिस्सा बन गया. रेलवे स्टेशन से लेकर चाय की टपरी तक यह प्रोडक्ट हर भारतीय की जरूरत बन गया. बच्चों का लंच बॉक्स हो या सुबह का नाश्ता, पारले-जी बिस्कुट ने हर जरूरत को पूरा कर दिया. साल 2011 में ग्लोबल रिसर्च फर्म नील्सन ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि पारले-जी दुनिया में सबसे ज्यादा बिकने वाला बिस्कुट बन गया है. साल 2013 में पारले पहला भारतीय एफएमसीजी ब्रांड बन गया, जो 5 हजार करोड़ का रिटेल बिजनेस करने वाली कंपनी बन गई।
100 देशों में फैला है कारोबार
पारले का कारोबार अब दुनिया के 100 देशों में फैल चुका है. अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, अफ्रीका जैसे देशों में इसके प्रोडक्ट की काफी डिमांड है. साल 1990 और 2000 के दशक में कंपनी ने मेलोडी टॉफी लॉन्च की, जिसने जल्द ही बच्चों के मन में जगह बना ली। अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब इटली की पीएम को मेलोडी की टॉफी गिफ्ट की तो एक बार फिर इस ब्रांड की चर्चा होने लगी।