सत्ता के शिखर पर रहते हुए इन्हें जनता ने हरा दिया... ममता से उमर अब्दुल्ला तक सीएम रहते हुए अपनी सीट हार चुके ये 8 नेता, जानें...
पश्चिम बंगाल में भाजपा ने ममता बनर्जी की टीएमसी को बुरी तरह रौंद दिया. हालात ये रहे कि ममता बनर्जी सीएम रहते हुए भी अपनी भवानीपुर सीट नहीं बचा पाईं. उन्हें भाजपा के सुवेंदु अधिकारी के हाथों तकरीबन 15 हजार वोटों से करारी शिकस्त मिली.ऐसा लगातार दूसरी बार हुआ है, इससे पहले 2021 में ममता बनर्जी नंदीग्राम सीट पर सुवेंदु के हाथों ही हारी थीं। खास बात ये है कि भारतीय राजनीति के इतिहास में ममता बनर्जी अकेली ऐसी नेता बन गई हैं जो सीएम रहते हुए लगातार दूसरी बार हारीं. उधर तमिलनाडु में सीएम एमके स्टालिन को भी कोलाथुर सीट से TVK उम्मीद से हार गए।
भारतीय राजनीति में चुनाव जीतना ही नहीं, अपनी सीट बचाना भी किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं होता. अब तक ऐसा कई बार हो चुका है जब सत्ता में बैठे सीएम को अपनी विधानसभा सीट भी गंवानी पड़ी है. शीला दीक्षित से लेकर उमर अब्दुल्ला तक कई नाम इस फेहरिस्त में शामिल हैं. ज्यादातर मामलों में एंटी इनकंबेंसी ही इनकी हार की प्रमुख वजह बनती है. कई बार स्थानीय समीकरण और मजबूत प्रतिद्वंद्वी अपने दम पर बाजी पलट देते हैं. आइए जानते हैं ऐसे ही नेताओं के बारे में।
ममता बनर्जी, पश्चिम बंगाल
दीदी को सीएम रहते हुए राज्य में दो बार हार का सामना करना पड़ा. इस बार वह भवानपुर सीट से हारी हैं, इससे पहले 2021 में उन्हें सुवेंदु अधिकारी ने नंदीग्राम सीट से हराया था, गनीमत थी कि पिछली बार पार्टी का प्रदर्शन राज्य में अच्छा था, मगर इस बार भाजपा ने पश्चिम बंगाल में बंपर जीत दर्ज की है. ममता बनर्जी की हार का प्रमुख कारण सुवेंदु अधिकारी माने जा रहे हैं. इसके अलावा स्थानीय स्तर पर भाजपा की मजबूती और टीएमसी में ध्रुवीकरण, एंटी इंकंबेंसी भी ममता की हार की प्रमुख वजह हैं।
बंगाल चुनाव में ममता बनर्जी की तमाम तैयारी फेल साबित हुई है
एमके स्टालिन, तमिलनाडु
एमके स्टालिन ने भी सीएम रहते हुए अपनी पांरपरिक कोलाथुर सीट को गंवा दिया. वह यहां 2011 से लगातार जीतते आ रहे थे. यहां उन्हें थलपति विजय की पार्टी TVK के वीएस बाबू ने हराया. वह पिछले 5 साल से सत्ता में थे, इसके बावजूद विजय की लहर में वह अपनी सीट नहीं बचा सके. इसके अलावा उनकी पार्टी डीएमके का प्रदर्शन भी निराशाजनक रहा और वह राज्य की सत्ता से बाहर हो गई।
उमर अब्दुल्ला, जम्मू-कश्मीरउमर अब्दुल्ला ने सीएम रहते हुए 2014 में दो सीटों से चुनाव लड़ा था, मगर उन्हें सोनवार सीट से हार का सामना करना पड़ा था, बीरवाह सीट से वह जीत गए थे. उनकी हार की वजह से 2014 में आई बाढ़ के दौरान राहत कार्यों का ठीक से न होना माना गया था. इसे लेकर जनता में असंतोष्ज्ञ था और सरकार एंटी इंकंबेंसी से भी जूझ रही थी।
शीला दीक्षित, दिल्ली
दिल्ली की लगातार तीन बार सीएम रहीं शीला दीक्षित को 2013 में नई दिल्ली सीट पर शिकस्त मिली थी. 2013 में उभरती आम आदमी पार्टी से बदले राजनीतिक समीकरणों के बीच AAP संयोजक अरविंद केजरीवाल ने उन्हें हराया था. शीला दीक्षित की हार की वजह महंगाई और भ्रष्टाचार के मुद्दे रहे थे. इसके अलावा कॉमनवेल्थ गेम्स में भी उनपर घोटाले के आरोप लगे थे।
हरीश रावत, उत्तराखंड
उत्तराखंड के सीएम रहते हुए हरीश रावत 2017 विधानसभा चुनाव मैदान में उतरे थे. उन्होंने हरिद्वार ग्रामीण और किच्छा दो जगह से पर्चा भरा था, हालांकि वह मतदाताओं को लुभाने में विफल रहे थे. हरीश रावत ने अपनी दोनों सीटें तो गंवाई ही थीं, कांग्रेस के हाथ से राज्य भी निकल गया था. इसकी वजह पार्टी के अंदर गुटबाजी और बीजेपी की मजबूत लहर को माना गया था।
पुष्कर सिंह धामी, उत्तराखंड
उत्तराखंड में 2022 विधानसभा चुनाव में पुष्कर सिंह धामी भी सीएम रहते हुए विधानसभा चुनाव हार गए थे. वह खटीमा से चुनाव मैदान में उतरे थे, जहां उन्हें कांग्रेस के भुवन चंद्र कापड़ी ने पराजित किया था. धामी की हार का कारण स्थानीय मुद्दों को माना गया था. हालांकि राज्य में भाजपा ने बंपर जीत दर्ज की थी और बाद में उपचुनाव जीतकर धामी सीएम बने रहे थे।
चरण जीत सिंह चन्नी, पंजाब
पंजाब की जनता ने 2022 में अपने सीएम को विधानसभा चुनाव नहीं जीतने दिया था. कांग्रेस सरकार में सीएम के तौर पर चरण जीत सिंह चन्नी को भरोसा था कि वह सरकार बनाएंगे. राजनीतिक समीकरण साधने के लिए चन्नी ने चमकौर साहिब और भदौर दो सीटें चुनीं. हालांकि आम आदमी पार्टी के उम्मीदवारों ने उन्हें बड़े मार्जिन से हराया. इसका कारण आम आदमी पार्टी की लहर और कांग्रेस के खिलाफ एंटी इंकंबेंसी को माना गया।
लक्ष्मीकांत पारसेकर, गोवा
2012 से गोवा में भाजपा सरकार थी, 2014 में लक्ष्मीकांत पारसेकर को सीएम बनाया गया, 2017 में जब पार्टी चुनाव मैदान में उतरी तो पारसेकर मांड्रेम सीट से मैदान में थे। चुनाव में कांग्रेस के दयानंद सोप्ते ने उन्हें हराया था.उनकी हार का कारण स्थानीय एंटी इनकंबेंसी को माना गया, हालांकि राज्य में भाजपा सरकार बनाने में सफल रही थी और मनोहर पर्रिकर एक बार फिर सीएम बनाए गए थे।