Opinion: बिहार में सम्राट तो बंगाल में शुभेंदु का बदमाशों पर सख्त रुख, फ्री हैंड मिलते ही अगिया बैताल बनी पुलिस...
बिहार, बंगाल और असम में अब भजपा के सीएम हैं. बिहार में नीतीश कुमार के इस्तीफे के बाद खाली हुई सीएम की कुर्सी सम्राट चौधरी को मिली है तो बंगाल में भाजपा के शुभेंदु अधिकारी तृणणमूल कांग्रेस (टीएमसी) को हरा कर सीएम बने हैं.असम के सीम हिमंता विस्व सर्मा तो दूसरी बार भाजपा को जिता कर मुख्यमंत्री हैं. तीनों ने महीने के अदर ही शपथ ली है. सम्राट चौधरी ने 9 अप्रैल को शपथ ली थी तो शुभेंदु अधिकारी ने 15 मई को पद भार संभाला. हिमंता दूसरी बार 15 मई सीएम बने. इनमें दो- सम्राट और शुभेंदु अपने-अपने राज्यों में धड़ाधड़ फैसले ले रहे हैं. बिहार में सम्राट ने पूर्ववर्ती नीतीश कुमार के नक्शे कदम पर चलने का फैसला किया है, जबकि शुभेंदु पूर्व सीएम ममता बनर्जी के फैसलों को पलटने में लगे हैं. दोनों के 7-7 प्रमुख फैसलों की बात करें तो इसमें शुभेंदु का पलड़ा सम्राट की तुलना में भारी दिखता है. महीने भर के अपने कार्यकाल में सम्राट ने अपराध रोकने के लिए एनकाउंटर तक की छूट पुलिस को दे डाली है तो शुभेंदु ने हफ्ते भर में कई ऐसे फैसले लिए हैं, जिनसे मुहल्लों में रंगदारों पर शामत तो आई ही गई है, घुपैठियों के भागने की रफ्तार भी तेज हुई है. बांग्लादेश बार्डर पर बाड़ लगाने के लिए ममता ने मुख्यमंत्री रहते जमीन नहीं दी. शुभेंदु ने जमीन तो दी ही, बीएसएफ और राज्य पुलिस के समन्वय पर भी उन्होंने जोर दिया है।
शुभेंदु और सम्राट में फर्क
बंगाल के सीएम शुभेंदु अधिकारी और बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी में एक फर्क है. शुभेंदु दो तिहाई बहुमत वाली सरकार का नेतृत्व कर रहे हैं, जबकि सम्राट चौौधरी मुख्यतः जेडीयू और 3 अन्य साथी दलों की मदद से एनडीए की सरकार चला रहे हैं. सहयोगी दलों की मर्जी के खिलाफ सम्राट कोई फैसला नहीं ले सकते. वे भी इस बात को समझते हैं. इसीलिए उन्होंने पहले ही कह रखा है कि नीतीश ने बीते 20 वर्षों में जिस लाइन पर सरकार चलाई, उसका वे अनुसरण करेंगे. जेडीयू के नेता भी बार-बार यह बताते हैं कि सम्राट चौधरी की सरकार नीतीश की नीतियों को ही आगे बढ़ाएगी. जेडीयू नेता और केंद्र सरकार के मंत्री ललन सिंह ने भी 2 दिनों पहले बेमौसम बरसात की तरह यह कह कर तहलका मचा दिया है कि नीतीश कुमार ने ही सम्राट चौधरी को अपना वारिस चुना है. इसके कई मायने निकाले जा रहे हैं. अव्वल यह कि इसकी अचानक जरूरत क्यों पड़ी. खाासकर तब, जब सम्राट चौधरी की सरकार के एक महीने पूरे हुए हैं. दूसरा यह कि कहीं सम्राट चौधरी की कुर्सी पर कोई खतरा तो नहीं है. तीसरा, यह भी हो सकता है कि जेडीयू के उन नेताओं की वे जुबान बंद करना चाहते हैं, जिन्हें नीतीश के बाद उनके बेटे निशांत के अलावा दूसरा कोई कबूल नहीं. सियासी गलियारे में तो चर्चा यह भी हो रही है कि सम्राट को भाजपा ने सिर्फ 6 महीने के लिए सीएम बनाया है. हालांकि इस चर्चा में कोई दम नहीं दिखता।
दोनों की ताकत समझिए
दोनों की तुलना इसलिए कि महीने भर के अंतराल पर जिन 3 मुख्यमंत्रियों ने पद भार संभाला है, उनमें असम के मुख्यमंत्री हिमंता विस्व सरमा के साथ ये भी दूसरे दलों से भाजपा में आए हुए हैं. भाजपा के कार्यकर्ता दूसरे दलों से आए लोगों से जल्दी तालमेल नहीं बिठा पाते, इसके बावजूद केंद्रीय नेतृत्व ने तीनों पर आंख मूंद कर भरोसा किया है. हिमंता कांग्रेस छोड़ भाजपा में आए हैं तो सम्राट चौधरी तकरीबन सभी दलों में घूम कर अब भाजपा के साथ हैं. तीनों 10 साल के अंदर ही भाजपा के साथ आए हैं. शुभेंदु अधिकारी भी कभी ममता बनर्जी की ही पार्टी के हिस्सा थे. 2021 में वे भाजजपा के साथ आए. हालांकि तब भाजपा को सफलता नहीं मिली. फिर भी ईमानदारी और निष्ठा के साथ शुभेंदु भाजपा के साथ बने रहे. आज तीनों भाजपा के कद्दावर नेताओं में शुमार हैं।
शुभेंदु पर भरोसा क्यों?
शुभेंदु पर भाजपा का भरोसा मुख्यतः 2 कारणों से पुख्ता हुआ है. अव्वल तो 2021 में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) छोड़ने के बाद प्रतिकूल परिस्थितियों में भी उन्होंने भाजपा का साथ नहीं छोड़ा. दूसरा और सबसे बड़ा कारण यह कि उन्होंने पहली बार 2021 में मामूली अंतर से ही सही, नंदीग्राम में ममता बनर्जी को हराया और इस बार (2026 में) उनके भवानीपुर में ही उन्हें परास्त किया. अन्य कारणों में यह कि उन्होंने ममता जैसी पोलिटिकल पर्सनैलिटी पर अपना चेहरा भारी बना दिया. ममता को उन्होंने उस स्थिति में पहुंचा दिया है कि टीएमसी के सांसदों-विधायकों के ही साथ छोड़ने की शंका जाहिर की जाने लगी है. ममता की बुलाई बैठक से कई सांसदों-विधायकों का गायब रहना इसी ओर इशारा करता है. इससे चिढ़ कर ममता भी खुद कह रही हैं कि जिन्हें जाना है, वे चले जाएं. जो बचेंगे, वे ही टीएमसी की संपत्ति हैं।
पश्चिम बंगाल के सीएम शुभेंदु अधिकारी की फोटो
सम्राट को ही क्यों चुना?
भाजपा ने बाहर से आए किसी नेता को बिहार में उतनी तवज्जो नहीं दी, जितनी सम्राट को मिली है. उनको सीएम बनाने में भाजपा ने अपने उन नेताओं की भी परवाह नहीं की, जो भले बोलें या न बताएं, लेकिन उनके मन में भी सीएम बनने के सपने जरूर पर रहे होंगे. मीडिया में ऐसे नेताओं के नाम भी उछले थे. दरअसल भाजपा की चुनावी कोर टीम जानती थी कि उसे बिहार में कामयाब होने के लिए जातीय समीकरण जरूरी है. सम्राट को भरोसे का साथी बनाने के लिए भाजपा उन्हें बारी-बारी से बड़ी जिम्मेदारियां सौंपती रही. विधानमंडल में नेता बनाया, अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी दी और 2 बार डेप्युटी सीएम बनाया. ट्रायल के तौर पर उन्हें नीतीश से गृह विभाग भी दिलवाया. बिहार में सरकार की कमान भाजपा के हाथ जाने का यह पहला संकेत था. आखिरकार भाजपा ने उनके सिर सीएम का ताज सजा दिया. किसी को परखने के लिए इतने टेस्ट शायद ही किसी अन्य पार्टी में देखने को मिले।
सम्राट की समस्याएं भी हैं
सम्राट गठबंधन की सरकार के सीएम हैं. नीतीश की नीतियों पर ही कुंडली मार कर बैठने से उनका काम नहीं चलने वाला. भाजपा ने इसी उम्मीद में उन पर भरोसा भी किया है. भाजपा का विस्तार भी तो उन्हें करना है. जेडीयू को मजबूत करने के लिए भाजपा ने उन्हें सीएम तो बनाया नहीं है. गठबंधन की सरकार चलाना कितना कठिन होता होगा, आम आदमी इसका अनुमान ही लगा सकता है. भाजपा के अगर 88 विधायक हैं तो जेडीयू के 85 हैं. कई बार अपने नखरे दिखा चुके चिराग पासवान अपने 19 एमएलए और इस्तीफा तक की धमकी दे चुके केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी भी 4 विधायकों के साथ सहयोगी हैं. ऐसे में सरकार चलाना कितना मुश्किल भरा काम होगा, समझा जा सकता है. वह भी तब, जब आखिरी दिन तक नीतीश कुमार बतौर सीएम योजनाओं की घोषणाएं करते रहे. आज भी उसके नेता बार-बार याद दिलाते हैं कि नीतीश की ही अनुकंपा से वे सीएम बने हैं. वे नीतीश की नीतियों को ही आगे बढ़ाएंगे।
RSS का भी ग्रीन सिग्नल
आरएसएस बैकग्राउंड के ही ज्यादातर नेता भाजपा में हैं. यह भी कह सकते हैं कि भाजपा के साथ जुड़ा हर आदमी आरएसएस का ही हो जाता है. दूसरे दलों से भाजपा में आए नेताओं के साथ तालमेल में थोड़ी अड़चन स्वाभाविक है. पर, इन तीनों नेताओं ने भाजपा और संघ से बेहतरीन तालमेल बिठा लिया है. तभी तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के महासचिव दत्तात्रेय होसबले ने शुभेंदु अधिकारी को लेकर अत्यंत स्नेहपूर्ण और सकारात्मक टिप्पणी की है. एक साक्षात्कार में होसबले ने कहा- 'हमें अपने इस बेटे पर गर्व है.' उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ परिवार में शामिल होने के लिए किसी औपचारिक सदस्यता फार्म पर हस्ताक्षर करने की जरूरत नहीं होती. होसबले ने बहू के उदाहरण से समझाया कि जैसे कोई बहू बिना कागजी प्रक्रिया के परिवार का अभिन्न अंग बन जाती है, ठीक उसी तरह वैचारिक रूप से जुड़ने वाले नेता भी स्वाभाविक रूप से संघ परिवार का हिस्सा हो जाते हैं. उन्होंने शुभेंदु अधिकारी, हिमंत बिस्वा सरमा, सम्राट चौधरी जैसे नेताओं का जिक्र करते हुए कहा कि स्कूली दिनों से आरएसस से जुड़ना अनिवार्य नहीं है. बाद में भी वैचारिक समानता पर वे परिवार का हिस्सा बन सकते हैं. यानी इनके भाजपा का सीएम बनने पर आरएसएस को भी कोई आपत्ति नहीं है।
जानें सम्राट के 7 फैसले
सम्राट चौधरी ने 15 अप्रैल 2026 को बिहार के मुख्यमंत्री का पद संभाला। पहले महीने में हुई उनकी कैबिनेट की बैठकों में 7 प्रमुख फैसले लिए गए, जो विकास, सुरक्षा, शिक्षा और सुशासन पर फोकस करते हैं।
1. 10 जिलों में 11 सैटेलाइट टाउनशिप विकसित करने की योजना- इससे सुनियोजित तरीके से शहरी विकास, चौड़ी सड़कें, हरियाली और सुविधाओं वाला टाउनशिप तैयार करना है।
2. 'पुलिस दीदी योजना'- महिला सुरक्षा के लिए इस योजना के तहत 1500 महिला पुलिस कर्मियों को स्कूटी देनी है। इनकी स्कूल-कॉलेजों के पास की जाएगी, ताकि कोई अप्रिय घटना न हो।
3. 'सहयोग की त्रिवेणी'- शिकायत निवारण के लिए हेल्पलाइन (1100), पोर्टल sahyog.bihar.gov.in और पंचायत स्तर पर शिविर की व्यवस्था. 30 दिनों में शिकायत निस्तारण नहीं होने पर अधिकारी पर कार्रवाई।
4. हर प्रखंड में एक मॉडल स्कूल- जिलों के स्कूलों और की स्थिति सुधारने के लिए हर ब्लाक में माडल स्कूल खोलने का सम्राट कैबिनेट ने फैसला लिया है. ऐसा हुआ तो शिक्षा में बेहतरी आएगी।
5. बिहारी ठेकेदारों को प्राथमिकता- 50 करोड़ तक के कार्यों में लोकल ठेकेदारों को तरजीह धी झाएघी. इशखे ळिए बिहार लोक निर्माण संहिता में संशोधन किय़ा जायेगा।
6. ई-निबंधन व्यवस्था लागू- रजिस्ट्री प्रक्रिया को डिजिटल और पारदर्शी बनाने के लिए सम्राट सरकार ने जमीन की खरीद-बिक्री में ई-निबंधन की व्यवस्था लागू की है।
7. अपराध पर जीरो टालरेंस- बिहार में अपराध सबसे बड़ी समस्या है. नीतीश कुमार की तरह सम्राट ने भी क्राइम, करप्शन और कम्युनिलिज्म पर जीरो टालरेंस की नीति अपनाई है।
बंगाल में शुभेंदु के 7 निर्णय
शुभेंदु अधिकारी ने बंगाल में फैसलों की झड़ी लगा दी है। उन्होंने ममता बनर्जी सरकार के अधिकतर फैसलों को पलत दिया है। अब जरा उनके फैसले देखिए-
1. आयुष्मान भारत योजना लागू- ममता बनर्जी ने नरेंद्र मोदी से खुन्नस में आयुष्मान भारत स्वास्थ्य बीमा योजना शुरू बंगाल में लागू नहीं की थी. शुभेदु ने इसे शुरू करने की इजाजत दे दी है।
2. बीएसएफ को बांग्लादेश बॉर्डर फेंसिंग के लिए जमीन - यह मामला ममता बनर्जी ने लटका रखा था. शुभेंदु ने 45 दिनों में हस्तांतरण, घुसपैठ और तस्करी रोकने के लिए जमीन देने का पैसला किया है।
3. नया आपराधिक कानून (BNS)- IPC/CRPC की जगह नया आपराधिक कानून भारतीय न्याय संहिता को शुबेंदु ने सीएम बनते ही तत्काल लागू कर दिया. ममता को इससे भी आपत्ति थी।
4. IAS/ IPS अधिकारियों को केंद्रीय प्रशिक्षण की अनुमति- प्रशासनिक सुधार की दिशा में यह शुभेंदु सरकार का बड़ा कदम है।
5. राजनीतिक हिंसा में मारे गए 321 भाजपा कार्यकर्ताओं के परिवारों को सहायता- यह शुभेंदु का बड़ा फैसला है. टीएमसी शासन में बड़े पैमाने पर भाजपा समर्थकों की हत्या हुई थी. उन्हें इस फैसले से राहत मिलेगी।
6. अपराध और गुंडागर्दी रोकने का फैसला- शुभेंदु ने रंगदारी रोकने, अवैध कब्जा करने और दूसरे बड़े अपराधों पर अंकुश के लिए पुलिस को सख्त हिदायत दी है. इससे टीएमसी संपोषित लोगों पर शामत आ गई है।
7. खुले में नमाज पढ़ने पर पाबंदी- शुभेंदु ने सड़कों पर नमाज पढ़ने से रोक दिया है. यही नहीं, धारिमक स्थलों पर ले लाउड स्पीकर का मानक भी तय किया है. इसकी अवहेलना करने वालों पर पुलिस एक्शन भी ले रही है।