क्रिकेट के 'वैभवों' से ही चलेगी BCCI की दुकान; आयरलैंड में टीम इंडिया नहीं, हेड कोच गौतम गंभीर का तमाशा हारा है...
India vs Ireland T20: T20 के विश्व चैंपियन की बिखरती बल्लेबाजी देख रहा था. दोनों ओपनर्स शून्य पर चले गए। दिल में न कोई हूक उठी, न दिमाग परेशान हुआ. खुद को अजीब लगा। खुद के बारे में सोचकर अजीब लगा.दशकों से जिस भारतीय क्रिकेट के लिए जीना-मरना रहा, उसकी दुर्दशा पर मैं निर्विकार था. मानो कोई फर्क ही नहीं पड़ रहा हो। टीम हारे या जीते! अपनी बला से। अब तक तो शायद ही अपनी टीम को लेकर ऐसी विरक्ति कभी हुई थी. हम टीम इंडिया के जबरा फैंस ने कितनी ही हार पर रात का खाना छोड़ा. कितनी ही नाकामियों पर हफ्तों निराशा के गर्त में रहा। मन उधेड़बुन में था. आयरलैंड के खिलाफ दूसरा और आखिरी मैच देखे जा रहा था, लेकिन उसे जी नहीं रहा था. सामने भारतीय टीम थी, लेकिन जैसे वो मेरी भारतीय टीम नहीं थी. जिसकी हार से मुझे कोई फर्क ही नहीं था, जिसकी जीत से मुझे खुश होना भी नहीं था।
इसी कशमकश के बीच ईशान गए. कप्तानी के लिहाज से 'बेस्ट ब्रेन' माने गए सरपंच श्रेयस अय्यर गए. अक्षर भी निपटे. ऑलराउंडर माने जाने वाले शिवम दुबे उसी स्कोर के आसपास गए, जो आमतौर पर उनकी रेंज (क्षमता) नजर आती है. तमाम मौकों पर देश को उबारने वाले तिलक वर्मा 55 पर कुछ ऐसे गए, जैसे वे फिफ्टी का टारगेट लेकर ही खेल रहे थे. इसके बाद शेडगे और फिर गंभीर की लीडरशिप वाली टीम में अपने लिए जगह सर्वाधिकार सुरक्षित रखने वाले हर्षित राणा की बारी भी आ गई।
देश की टीम हार गई. मैं ज्यादा दुखी नहीं हुआ! ईमानदारी से कहूं, तो दुखी ही नहीं हुआ. लेकिन इसके बाद अब मैं इस चिंता में डूबने-उतराने लगा कि भारत की हार पर दुखी क्यों नहीं हुआ? आयरलैंड जैसी टीम से 0-2! फिर भी मैं हताश क्यों नहीं हुआ? मुझे आखिर हुआ क्या? क्या मैं देश से प्यार नहीं करता? आज तक पहले तो कभी ऐसा नहीं हुआ? मेरे जैसे एक अदना क्रिकेट फैन के जेहन में ये बदलाव क्यों आया? लेकिन थोड़े ही मंथन के बाद मैं निष्कर्ष पर भी पहुंच गया और अपराधबोध से बाहर भी निकलने लगा।
आयरलैंड में 'टीम इंडिया' नहीं हारी
आयरलैंड में जो टीम खेल रही थी, क्या वो टीम इंडिया थी? नहीं. तमाम फैंस का इस टीम को देखने का अपना नजरिया हो सकता है, ये उनका अधिकार भी है, लेकिन मैं इसे टीम इंडिया नहीं मानता. बिल्कुल भी नहीं मानता. मैं इसे 'टीम BCCI' मान सकता हूं. 'टीम गौतम गंभीर' कह सकता हूं. देश की टीम देश के लिए खेलती है. रेवेन्यू के लिए नहीं. रेवेन्यू के लिए क्रिकेट की अति की जाती है. क्रिकेट की अति से खिलाड़ियों पर दबाव बढ़ता है. उनकी फिटनेस खराब होती है. फिर देश के लिए शायद ही कभी आप अपना बेस्ट-11 खिलाने की हालत में होते हैं. फिर आती है 'आयरलैंड कॉमेडी'. क्योंकि जो हुआ, उसे मैं ट्रैजेडी भी नहीं मानता. और हां, आपको ये भी बता दूं कि इस छोटी-सी सीरीज से भी BCCI ने कई करोड़ रुपये फिर भी कमा लिए. यानी मुख्य टारगेट पूरा हुआ, रेवेन्यू का टारगेट।
IIM में पढ़ाई होनी चाहिए
देश को T20 विश्व कप दिलाने वाला कप्तान टीम से ही बाहर कर दिया जाता है. IPL के प्लेऑफ में भी टीम को ले जाने में नाकाम कप्तान को बेहतरीन कप्तान मान लिया जाता है। उसे 'टीम गौतम गंभीर/BCCI' की जिम्मेदारी सौंप दी जाती है. लेकिन उसी IPL में सबसे अधिक स्कोर करने वाले बल्लेबाज को डेब्यू का वो मौका नहीं दिया जाता, जहां देश ही नहीं, पूरी दुनिया के क्रिकेट फैंस उसका खेलना पक्का मान रहे होते हैं. उसे खेलते देखना भी चाह रहे हों. उस वैभव सूर्यवंशी को आयरलैंड के खिलाफ बाहर ही बिठाकर रखा जाता है, जो IPL में दुनिया भर के बेस्ट बॉलर्स को कूटकर वहां पहुंचा होता है. और हां, कुछ ऐसा ही तो तब भी हुआ था, जब चैंपियंस ट्रॉफी दिलाने वाले रोहित को रिटर्न गिफ्ट में विदा हो जाने दिया गया था. टीम प्रबंधन के ये ऐसे लॉजिक हैं, जिन पर IIM में पढ़ाई होनी चाहिए।
क्रिकेट के फैंस बढ़े हैं या तमाशे के?
देश की जीत टारगेट नहीं है. मुख्य टारगेट रेवेन्यू है. तो फिर भारत समेत दुनिया भर में क्रिकेट के फैंस इतनी संख्या में बढ़े कैसे हैं? लगातार बढ़ कैसे रहे हैं? तो इन सवालों का भी जवाब है. सोशल मीडिया पर दिन भर आने वाली अनर्गल-बेहूदा रील्स के कोई कम व्यूअर हैं क्या? चलिए इस बार के लिए बख्श देते हैं. क्रिकेट कितना भी विकृत हुआ हो, उसकी तुलना सोशल मीडिया की रील्स से नहीं करते हैं. अभी थोड़ी ज्यादती हो जाएगी. खैर, वैसे तो सीरियस क्रिकेट के भी खासे दर्शक हैं, लेकिन चलो हमें आपके ये तमाशे भी पसंद हैं. क्योंकि ये इंटरटेन तो करते ही हैं. मगर आपने क्या किया? वर्ल्ड क्रिकेट के आज के संभवतः सबसे बड़े एंटरटेनर को बाहर बिठाए रखा। और नतीजे में मिला क्या? 0-2 की शिकस्त!
वैभव अगर खेले होते
अगर वैभव सूर्यवंशी आयरलैंड के खिलाफ पहला T20 खेलते, तो उस दिन उनकी उम्र 15 वर्ष 71 दिन होती. अब अगर इंग्लैंड के साथ पहले T20 में मौका मिला, तो उस दिन उनकी उम्र 15 वर्ष 96 दिन होगी. रिकॉर्ड तब भी बनता, रिकॉर्ड अब भी बनेगा. गंभीर-श्रेयस की समझदार जोड़ी इंग्लैंड के खिलाफ भी मौका नहीं देगी, रिकॉर्ड तब भी बनेगा. क्योंकि सचिन का जो रिकॉर्ड है, वह 16 वर्ष 205 दिन का है.
क्रिकेट का हमारा ज्ञानी मैनेजमेंट कह सकता है कि ये क्या बात हुई? किसी इंडिविजुअल के रिकॉर्ड के लिए क्या हम टीम कॉम्बिनेशन बदल दें? लेकिन जिन फैंस के बूते इन ज्ञानी क्रिकेट प्रबंधकों की नौकरी है, उनके दिल की भी तो आपको सोचनी ही होगी. क्योंकि खेल की बदौलत सितारे बनते हैं, तो इसका उल्टा भी उतना ही सही है. सितारे की बदौलत ही खेल भी चमकता है. खासतौर से भारत जैसे जुनूनी देश के लिए तो ये बात और भी मौजू है. क्या BCCI ने कभी ये कैलकुलेशन किया कि एक गावस्कर, एक कपिल देव, एक सौरव गांगुली, एक तेंदुलकर, एक धोनी, एक विराट कोहली जैसे सितारों ने इस BCCI के खाते में कितने लाख या करोड़ नए क्रिकेट फैंस जोड़े?
क्रिकेट के 'वैभवों' से ही चलेगी आपकी दुकान
क्रिकेट दो पैमानों पर तेजी से बदला है. पहला- इसका तमाशाई स्वरूप विकसित हुआ. दूसरा- क्रिकेट की अति. और इन दोनों ही पैमानों पर अपनी BCCI सबसे आगे है. क्रिकेट को जितना BCCI ने निचोड़ा है, उतना किसी और ने नहीं. एक दलील बार-बार दोहराई जाती है. कहा जाता है कि क्रिकेट बड़ा है, खिलाड़ी नहीं. सच तो ये है कि आज क्रिकेट हांफ रहा है. क्रिकेटर का शरीर से लेकर दिमाग तक बेइंतहां दबाव में है. बड़ा और इसीलिए बढ़ा है तो बस क्रिकेट प्रशासक, क्रिकेट प्रबंधक और क्रिकेट के इन्वेस्टर. लेकिन क्रिकेट के इन जो बड़े और बुद्धिमानों की जमात है, उन्हें भी आसरा क्रिकेटरों का ही चाहिए. और क्रिकेटरों से बढ़कर भी उन्हें क्रिकेट के सितारे ही चाहिए. क्रिकेट के ये सितारे ही उनकी जान, प्राण और सांस हैं. तभी तो IPL के ऑक्शन में इन सितारों के लिए लूट मचती है. क्योंकि एक अदद सितारा एक फ्रेंचाइजी की पूरी दुकान चला जाता है।
7 नंबर की जर्सी में 44 वर्ष के महेंद्र सिंह धोनी मैदान पर आकर दो-तीन गेंद ही खेल जाते हैं, तो फैंस के पैसे ही नहीं वसूल होते, अपार खुशियों की शक्ल में मानो मोटा कैशबैक भी मिल जाता है.15 बरस के वैभव को देखने के लिए विदेश में खाली रहने वाले स्टेडियम की सभी टिकटें बिक जाती हैं। लेकिन यही वैभव मौजूदा BCCI की टीम के दो बेस्ट ब्रेन को आयरलैंड के खिलाफ प्लेइंग इलेवन के लायक नहीं नजर आते. मगर BCCI के महानुभावों और क्रिकेट के सभी स्टेकहोल्डर्स, आप याद रखना- आपकी दुकान क्रिकेट के इन 'वैभवों' से ही प्रॉफिट-मेकिंग बनेगी।