दुनिया देखने के सपने पर भारी पड़ा देशभक्ति का जज्बा, रिटायरमेंट के बाद सैनिक कल्याण कोष में दान कर दी जीवन भर की कमाई...
डिजिटल डेस्क, नागपुर। कहते हैं कि देश की सेवा सिर्फ सीमा पर बंदूक थामकर ही नहीं की जाती, बल्कि सरहद पर तैनात वीरों के प्रति कृतज्ञता का भाव रखकर भी की जा सकती है। नागपुर के रहने वाले 70 वर्षीय सेवानिवृत्त बैंक कर्मचारी श्रीकांत सहस्रबुद्धे ने कुछ ऐसा ही कर दिखाया है। उन्होंने दुनिया घूमने के अपने और अपनी दिवंगत पत्नी के अधूरे सपने की बलि दे दी, और अपनी जीवन भर की गाढ़ी कमाई से जोड़े गए 25.51 लाख रुपये 'सेना केंद्रीय कल्याण कोष' में दान कर दिए। विश्व भ्रमण का था सपना, नियति को कुछ और था मंजूर श्रीकांत सहस्रबुद्धे और उनकी पत्नी दोनों ही पंजाब नेशनल बैंक में कार्यरत थे।
नौकरी के दौरान दोनों ने मिलकर एक खूबसूरत सपना बुना था - रिटायरमेंट के बाद दुनिया की सैर करने का। इसके लिए उन्होंने अपनी प्रोविडेंट फंड की एक पूरी राशि को छूआ तक नहीं था और उसे बचाकर रखा था। लेकिन नियति का क्रूर फैसला देखिए, श्रीकांत के सेवानिवृत्त होने से ठीक छह महीने पहले ही उनकी जीवन संगिनी ने इस नश्वर संसार को अलविदा कह दिया।
पत्नी के जाने के बाद दुनिया घूमने का वह हसीन सपना बिखर गया। बच्चे अपने-अपने जीवन में अच्छी तरह व्यवस्थित हो चुके थे। ऐसे में श्रीकांत जी के सामने यक्ष प्रश्न था कि इस बड़ी राशि का क्या किया जाए? तभी उनके अंतर्मन से एक आवाज आई कि क्यों न इस धन का उपयोग उन वीरों के लिए किया जाए जो देश की सीमाओं पर अपनी जान की बाजी लगाते हैं।वह बताते हें, "उसी रात मेरे मन में विचार आया कि मुझे अपने अधूरे सपने के पैसे सेना को दान कर देने चाहिए। मुझे पता था कि इन पैसों का इस्तेमाल सीमा पर अपने प्राणों की आहूति देने वाले जवानों के परिवारों, खासकर उनके बच्चों और विधवाओं के कल्याण के लिए होगा।"
आंखों में आंसू और दिल में असीम संतोष
श्रीकांत ने नागपुर में उत्तर महाराष्ट्र और गुजरात सब एरिया के जनरल ऑफिसर कमांडिंग, मेजर जनरल नवतेज एस. सोहल से मुलाकात कर उन्हें 25.51 लाख रुपये का चेक सौंपा। यह केवल कागज का एक टुकड़ा नहीं, बल्कि एक भावुक पति का अपनी पत्नी को दिया गया अनोखा तर्पण और देश के प्रति अगाध प्रेम का प्रतीक था। पूंजी सौंपते वक्त श्रीकांत की आंखें भर आईं, लेकिन यह आंसू दुख के नहीं बल्कि परम संतोष के थे।
उन्होंने भावुक होते हुए कहा, "मैं अपने आंसू रोक नहीं पा रहा हूं। मुझे जो खुशी मिल रही है, उसे शब्दों में बयां करना नामुमकिन है। मुझे अपनी पत्नी के साथ दुनिया घूमने से जितनी खुशी मिलती, उससे कहीं गुना ज्यादा आनंद इस दान से मिल रहा है। आज मेरी पत्नी जहां कहीं से भी मुझे देख रही होगी, बेहद खुश होगी।"रक्षा अधिकारियों ने श्रीकांत सहस्रबुद्धे के इस अतुलनीय योगदान की सराहना करते हुए इसे नि:स्वार्थ सेवा और नागरिक जिम्मेदारी का एक अनुकरणीय उदाहरण बताया। यह दान उन शहीद परिवारों, दिव्यांग सैनिकों और युद्ध विधवाओं के जीवन में उजाला लाएगा जिन्होंने देश के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया। उनका यह कदम हर भारतीय के दिल में राष्ट्रभक्ति और कृतज्ञता की एक नई अलख जगाता है।