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श्री ए के केसरी का कॉलम बेबाक बोल :: संतति प्रीत सदा चली आई, प्राण जाए पर ! परिवारवाद  ना जाई...

श्री ए के केसरी का कॉलम बेबाक बोल :: संतति प्रीत सदा चली आई, प्राण जाए पर ! परिवारवाद ना जाई...

सम्पादकीय लेख : बगावत को अगर बहादुरी का पैमाना माना जा सकता है तो हम अभी तक लगे आरोपों के मद्देनजर मुख्यमंत्री मोहन यादव की तारीफ करेंगे। वहां, भाजपा की वैचारिकी के खिलाफ खुली बगावत है। जो पार्टी परिवारवाद के विरोध के नारे के साथ सत्ता में आई थी अब उसके नेता पर आरोप है कि न सिर्फ अपने परिवार का बल्कि अपने विस्तारित परिवार की उन्नति का भी ध्यान रख रहे हैं। 

मध्य प्रदेश से आई ताजा तस्वीर पर सोशल मीडिया कह रहा है 'बाकी तो सपने होते हैं, अपने तो अपने होते हैं'। दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश में राजनाथ सिंह की संतति भी खुला संदेश दे रही हैं कि अब परिवार ही प्रथम है। हिमाचल प्रदेश में धूमल परिवार बता ही चुका है कि मेरी राजनीति की उत्तराधिकारी मेरी संतति है। राजनीति में परिवारवाद का मतलब होता है हितों के टकराव में शुचिता के खिलाफ जाना। मध्य प्रदेश से लेकर उत्तर प्रदेश, बिहार से लेकर आंध्र प्रदेश तक भाजपा और उसके सहयोगी दल निज संतति के विकास में लगे हैं। 2014 में परिवारवाद पर वार और अब परिजन कल्याण परियोजनाओं के द्वंद्व को बताता बेबाक बोल।

इन दिनों 2014 बहुत याद आ रहा है। खास कर राजनीतिक टिप्पणीकारों को। भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने का एक सुकून था, प्रधानमंत्री को मौन कहने का जुनून था। तब एक जमाई था और विपक्ष के सवालों में उसकी कमाई थी। तब जमाई की जमीन, पूरी कांग्रेस और सत्ता-पक्ष की मानी जा रही थी।

तब मनमोहन सिंह के पास यह कहने की सुविधा नहीं थी कि मेरे प्रधानमंत्री पद का कांग्रेस अध्यक्ष के जमाई से क्या लेना। अगर सोनिया गांधी कांग्रेस अध्यक्ष हैं तो क्या उनके परिवार से जुड़े लोग कारोबार छोड़ दें? एक जमीन से जुड़े मामले में आरोपी होने के बाद राबर्ट वाड्रा के जरिए पूरी कांग्रेस भ्रष्टाचार का पर्याय बना दी गई। विपक्ष की चुनावी सभाओं में जमाई की कमाई पर तंज और जुमलों की बाढ़ थी।

राबर्ट वाड्रा कांग्रेस के सदस्य नहीं हैं और तब प्रियंका गांधी भी मौसमी राजनेता ही थीं। लेकिन उस वक्त के विपक्ष की यही मांग थी कि गांधी परिवार का जमाई होने के नाते राबर्ट वाड्रा को राजनीतिक शुचिता का पूरा बोझ अपने कंधों पर उठा लेना चाहिए। उस वक्त के हालात को याद कीजिए। राजनीतिक शुचिता इतनी चरम पर थी कि कारोबार तो छोड़ दीजिए, माहौल ऐसा था कि तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष के जमाई होने के कारण राबर्ट वाड्रा को सड़क पर भी चलने का अधिकार नहीं है।

2014 में एक जुमला बहुत दोहराया जाने लगा। जनता को संदेश दिया गया कि रोटी पलटी नहीं गई है, इसलिए जल गई। भ्रष्टाचार के आरोपों की राख में कांग्रेस का अस्तित्व धुंधला हो गया। जनता ने रोटी क्या पलटी, देश का इतिहास पलट गया। जिस पार्टी की सरकार आई वो दावा करने लगी कि हमने जल-जंगल-जमीन पर काम किया है।

लोगों को लगा कि कम से कम अब जल-जंगल-जमीन वाला भ्रष्टाचार तो खत्म हो जाएगा। तभी एक निजी कंपनी को आदिवासी जमीन आबंटित करने को लेकर अदालत में एक जज की आवाज गूंजती है, 'क्या यह कोई मजाक है? क्या आप एक पूरा राज्य/जिला दे रहे हैं।' अब मौनमोहन पर मीम बनाने वाली जनता मीम बना रही…एक पेड़ मां के नाम, पूरा जंगल फलां के नाम…।

सत्ता पक्ष के लिए अब अपनी जली को भली बताने का वक्त है। लोकतंत्र के रंगमंच के लिए पटकथा लिखी जाती है। गौर फरमाइए कि पटकथा और कथा में एक तकनीकी अंतर होता है। कथा और पटकथा में मुख्य अंतर यह है कि कथा क्या हुआ बताती है, जबकि पटकथा बताती है कि कथा मंच पर कैसी दिखेगी या सुनाई देगी। पटकथा में दृश्य, संवाद, स्थान, समय और पात्रों की गतिविधियों का ब्योरा होता है।

ऐसी ही पटकथा लिखी गई अंतिम पंक्ति के आदमी की। व्यवस्था द्वारा पहले से ही चुन लिए गए कलाकार को अंतिम पंक्ति में बिठाया जाता है। निर्देशक के अनुसार मुख्यमंत्री या फलां पद के लिए उस नाम के अलावा हर किसी का नाम ले लिया जाता है। लेकिन अंत में अंतिम आदमी की 'कास्टयूम' पहने व्यक्ति को बुलाया जाता है और तुरूप का पत्ता कह कर उसका जोरदार स्वागत किया जाता है।

अब हमारी रोटी जली है फिर भी भली है वाले अध्याय में तर्क दिया जा रहा है कि मुख्यमंत्री के परिवार से हैं तो क्या कारोबार करना छोड़ दें? क्या 2014 के पहले यह तर्क देने की सुविधा तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष के रिश्तेदार को थी? मध्य प्रदेश ने इसके पहले भी कई भ्रम तोड़े हैं। स्वच्छता का कीर्तिमान बनाने वाले इंदौर के भागीरथपुरा में जल संदूषण के कारण आधिकारिक और अदालती रिकार्ड के अनुसार 25 से 36 लोगों की मौत हुई। मुख्य पेयजल की पाइपलाइन में गटर के पानी का रिसाव हो गया था।

सबसे साफ शहर के तमगे वाले शहर में पीने के पानी में गटर के पानी की मिलावट हो सकती है तो फिर कथित जमीनी नेता करोड़ों की जमीन के मालिक भी हो सकते हैं। पानी के प्रदूषण पर कार्रवाई करते हुए नगर निगम के दोषी क्षेत्रीय अधिकारियों और इंजीनियरों को तत्काल प्रभाव से निलंबित व बर्खास्त कर दिया गया था। सवाल है कि अब राजनीति में परिवारवाद के प्रदूषण पर चुप्पी क्यों साध ली गई है। हर तरफ नेताओं की संतति ही आगे क्यों आ रही है?ए राजा, शशि थरूर, दयानिधि मारन, पवन कुमार बंसल, अश्विनी कुमार, वीरभद्र सिंह…यूपीए सरकार के ये वो नाम हैं जिन्हें भ्रष्टाचार या अन्य मामलों में नाम आने के बाद इस्तीफा देना पड़ा। शिवराज पाटिल आतंकवादी हमले के बाद कपड़े बदलने के आरोप में घिर गए थे।

ये तब की बात है जब आरोप लगने पर इस्तीफे होते थे, फिर भी जनता ने भ्रष्टाचार को लेकर शून्य सहिष्णुता रखते हुए यूपीए की पूरी सत्ता का ही इस्तीफा ले लिया था। दुनिया भर के लोकतंत्र में राजनीतिक पदों पर हितों के टकराव को शुचिता का पैमाना माना गया है। इन दिनों कई देशों में शीर्ष पदों पर इसलिए इस्तीफे हुए हैं, क्योंकि उत्तरदायित्व के प्रश्न को निरुत्तर नहीं किया गया।

वहीं हमारे यहां अति गंभीर आरोपों पर सन्नाटे की रणनीति अपनाई गई है। किसी भी तरह के सवाल पूछने वालों को देशद्रोही, आतंकवादी का खिताब देने का चलन तो पहले से बना हुआ है। हितों के टकराव का इतना बड़ा मामला सामने आने के बाद यही लगता है कि व्यवस्था इस बात को लेकर निश्चिंत हो चुकी है कि जनता सत्ता बदलने के लिए किसी तरह का टकराव करेगी ही नहीं। सत्ताधारियों से जुड़ा कुनबा जल-जंगल जमीन का मालिक होता जाएगा और जनता जाति व धर्म के मसले पर उलझी रहेगी।

सत्ता व्यक्ति को भ्रष्ट करती है…इस युगीन सिद्धांत को आपने खुद पर कुछ ज्यादा ही लागू कर दिया। यह साबित हो चुका है कि आपका चाल, चलन और चेहरा मौके की ही बात थी। सत्ता और जनता के खजाने की चाबी मिलते ही आप पहले वालों से ज्यादा भ्रष्ट-से दिखने लगे हैं। पहले वालों से ज्यादा भ्रष्ट-से इसलिए क्योंकि तब रोटी पलटने का भ्रम तो बना रहता था।

भ्रष्टाचार के आरोप सामने आने के बाद सत्ता जनता से कहती थी, आप रोटी मत पलटिए, हम मुख्यमंत्री, मंत्री या संतरी पलट देते हैं। उस पलट से जनता लोकतांत्रिक विरेचन जैसा महसूस करती थी। आपने खुशफहमी पाल ली है कि जनता राजनीतिक आलस्य में जली रोटी खा लेगी, लेकिन उसे पलटेगी नहीं। इसलिए कोई संतरी, मंत्री या मुख्यमंत्री पलटाए जाने के लिए तैयार नहीं है।

एक तरफ देश की 81 करोड़ जनता अपना पेट भरने के लिए सरकार के मुफ्त राशन पर निर्भर है, दूसरी तरफ आरोप है कि सत्ता में भागीदारी मिलते ही मुख्यमंत्री के कुनबे की जमीन बढ़ती गई। इतनी बड़ी असमानता साफ दिखने के बाद लग रहा है कि भाजपा के नेताओं ने हमारा परिवारवाद जायज है वाले घोषणापत्र पर मुहर लगवा ली है।

2014 के पहले का मौन विपक्ष द्वारा निर्मित था, 2026 का मौन आपका अर्जित है। आरोप है कि अब सत्ता से जुड़े नेता अंतिम आदमी की 'कास्ट्यूम' को उतार कर जनता के खजाने के दरवाजे पर खुल जा सिम-सिम कह रहे हैं। अब पर्ची भी दूसरी तरफ से आ रही है, जिसमें लिखा होता है, इस पद पर मेरी संतति कृपया।।