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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी को उनकी पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि अर्पित किया...

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी को उनकी पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि अर्पित किया...

नईदिल्ली, ब्यूरो। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज मंगलवार को डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की पुण्यतिथि पर उन्हें श्रद्धांजलि दी। उन्होंने मुखर्जी को एक महान देशभक्त, विद्वान और राजनेता बताया, जिन्होंने अपना जीवन भारत के विकास के लिए समर्पित कर दिया। 

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'X' पर पीएम मोदी ने कहा, "उनके बलिदान दिवस पर, मैं डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को श्रद्धांजलि देता हूं। वे एक महान देशभक्त, विद्वान और राजनेता थे, जिन्होंने अपना जीवन भारत के विकास के लिए समर्पित किया। उनका अटूट विश्वास, सार्वजनिक जीवन में साहस और राष्ट्रीय हित के प्रति समर्पण पीढ़ियों को प्रेरित करता रहेगा। 

डॉ. मुखर्जी का बलिदान हमारी सामूहिक स्मृति में हमेशा बसा रहेगा। हम उन मूल्यों को अपनाते हुए एक मजबूत और विकसित भारत बनाने के अपने संकल्प को दोहराते हैं, जिन्हें उन्होंने जीवन के अंतिम क्षण तक माना और जिनके लिए काम किया।"

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी एक शिक्षाविद, बैरिस्टर और राजनेता थे, जिन्होंने आज़ादी के बाद भारत की राजनीतिक दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाई।

उन्होंने 1934 से 1938 तक कलकत्ता विश्वविद्यालय के सबसे युवा कुलपति के रूप में काम किया और भारत में उच्च शिक्षा के विस्तार के लिए बड़े पैमाने पर काम किया। आज़ादी से पहले राजनीति में कदम रखने के बाद, वे शुरू में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़े, लेकिन बाद में हिंदू महासभा के एक प्रमुख नेता के रूप में उभरे।

आज़ादी के बाद, वे 1947 से 1950 तक प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की कैबिनेट में भारत के पहले उद्योग और आपूर्ति मंत्री बने। हालांकि, वैचारिक मतभेदों के कारण उन्होंने इस्तीफा दे दिया और 1951 में भारतीय जनसंघ की स्थापना की।

उन्हें भारतीय जनसंघ के संस्थापक के रूप में सबसे ज्यादा जाना जाता है, जो आज की भारतीय जनता पार्टी (BJP) का पूर्ववर्ती संगठन है। पंडित नेहरू सरकार की कई नीतियों के कड़े आलोचक रहे मुखर्जी ने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, राष्ट्रीय एकता और आत्मनिर्भरता पर ज़ोर दिया।

6 जुलाई 1901 को कलकत्ता (अब कोलकाता) में जन्मे डॉ. मुखर्जी शिक्षाविदों और कानून के दिग्गजों के एक प्रतिष्ठित परिवार से थे। उनका जीवन बौद्धिक उत्कृष्टता और राजनीतिक नेतृत्व का एक अनूठा मिश्रण था, और उन्होंने भारतीय राजनीति में एक राष्ट्रवादी विकल्प की नींव रखी।

मुखर्जी का राजनीतिक सफर 1929 में शुरू हुआ, जब वे एक निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में बंगाल विधान परिषद के लिए चुने गए। हालांकि बाद में वे कांग्रेस में शामिल हो गए, लेकिन वैचारिक मतभेदों के कारण उन्होंने खुद को उससे अलग कर लिया और 1930 के दशक में हिंदू महासभा से सक्रिय रूप से जुड़ गए। उन्होंने उन नीतियों का विरोध किया जो उनकी नज़र में हिंदू हितों को नुकसान पहुँचाती थीं।

उद्योग और आपूर्ति मंत्री के तौर पर, उन्होंने औद्योगीकरण को बढ़ावा देकर, लघु उद्योगों का समर्थन करके और आत्मनिर्भरता की वकालत करके भारत के औद्योगिक विकास की नींव रखने में अहम भूमिका निभाई। कश्मीर, पाकिस्तान और धर्मनिरपेक्षता जैसे मुद्दों पर नेहरू के साथ मतभेदों के कारण आखिरकार 1950 में उन्हें इस्तीफा देना पड़ा।

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, आर्थिक आत्मनिर्भरता और राष्ट्रीय एकता के सिद्धांतों पर आधारित, भारतीय जनसंघ उनके नेतृत्व में एक अहम विपक्षी ताकत के रूप में उभरा। उनकी सोच ने राष्ट्रवाद, पहचान और शासन-व्यवस्था पर भविष्य की राजनीतिक बहसों को आकार देने में मदद की।

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने आज़ादी के बाद के भारत में शिक्षा, राजनीति, राष्ट्रवाद, समाज सुधार और संवैधानिक बहसों में अहम योगदान दिया।