पांच दिवसीय कजरी कार्यशाला में लोक गायिका पद्मश्री मालिनी अवस्थी ने गंगोत्री क्रूज़ पर इस विधा के सिखाए गुर...
वाराणसी, न्यूज। गुरुपूर्णिमा पर आयोजित पांच दिवसीय कजरी कार्यशाला में लोक गायिका पद्मश्री मालिनी अवस्थी ने बुधवार को इस विधा के गुर सिखाए। कार्यशाला की थीम 'रिमझिम बरसे बदरिया' रखी गई थी।इसमें युवा कलाकारों को पूर्वांचल सहित लखनऊ, सीतापुर, प्रतापगढ़ और उन्नाव की लोक संगीत गायन शैलियों का प्रशिक्षण दिया गया।
गंगोत्री क्रूज पर आयोजित इस कार्यशाला में मालिनी अवस्थी ने युवा संगीत साधकों को कजरी के साथ-साथ दादरा, झूला, चैती और अवधी लोकगीतों से परिचित कराया। उन्होंने लोकगीतों की भाव-भंगिमा, सुरों के उठान, शब्दों के उच्चारण और प्रस्तुति की बारीकियां समझाते हुए कलाकारों को पारंपरिक लोक संगीत की गहराई से अवगत कराया। सचल कार्यशाला के अंतिम दिन कलाकारों की प्रतिभा का परीक्षण भी किया गया।
'झूला धीरे से झुलाओ बनवारी, अरे सावरिया...' गीत के माध्यम से कोरस के सुरों का अभ्यास कराया गया। इसके बाद 'अब बरखा बहार के आई गईले ना...' जैसे कजरी गीतों की प्रस्तुति ने वातावरण को सावन की लोक छटा से भर दिया。कार्यशाला में लोक गीतों की प्रस्तुति
'माई विंध्याचल के महिमा अपार बा, ऊंचा दरबार बा ना...' कजरी गीत की प्रस्तुति के दौरान लोक भावनाओं की सुंदर अभिव्यक्ति देखने को मिली। गीत की धुन और भाव से प्रभावित होकर कार्यक्रम में मौजूद महिलाएं स्वयं को नृत्य करने से नहीं रोक सकीं। अवधी लोकगीत 'हे री सखी, निमिया तले डोली रख दे मुसाफिर, आई सावन की बहार रे...' की प्रस्तुति ने कार्यक्रम को और भावपूर्ण बना दिया। इस दौरान मालिनी अवस्थी के सुरों के मधुर उठान और लोक शैली की प्रभावशाली प्रस्तुति ने उपस्थित दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।कार्यशाला का उद्देश्य
मालिनी अवस्थी ने कहा कार्यशाला का उद्देश्य युवा कलाकारों को भारतीय लोक संगीत की समृद्ध परंपराओं से जोड़ना और विलुप्त होती लोक विधाओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाना रहा। पांच दिनों तक चले इस आयोजन में कलाकारों ने न केवल गीतों का अभ्यास किया, बल्कि लोक संगीत के इतिहास, संस्कृति और प्रस्तुति की परंपराओं को भी समझा।