Explained: UP गवर्नर बोलीं- 'लड़कियां पढ़ाई के समय प्रेग्नेंट...', जबकि 15 साल में 9.2% घटी ग्रोथ, कैसे गलत साबित हुईं राज्यपाल?...
लखनऊ। 7 जुलाई 2026 को उत्तर प्रदेश की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने लखनऊ के डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम टेक्निकल यूनिवर्सिटी (AKTU) के 24वें दीक्षांत समारोह में एक बयान दिया, जिसने सियासी और सामाजिक हलचल मचा दी.राज्यपाल ने कहा, 'पढ़ाई के दौरान लड़कियां प्रेग्नेंट हो जाती हैं. कइयों को बच्चा भी हो जाता है. उस बच्चे की जिम्मेदारी सरकार पर जाती है. ऐसा पराक्रम आप लोग मत करिए. शादी आत्मनिर्भर होने के बाद ही करें. ' लेकिन क्या इसके फैक्ट सही हैं, क्या सच में पढ़ाई के दौरान लड़कियां प्रेग्नेंट हो रही हैं?
क्या वाकई लड़कियां पढ़ाई के समय प्रेग्नेंट हो रही हैं?
राज्यपाल के बयान में 'लड़कियां प्रेग्नेंट हो जाती हैं' को एक आम बात के तौर पर पेश किया गया है. लेकिन राष्ट्रीय आंकड़े कुछ और ही कहानी बताते हैं।
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (NFHS-5, 2019-21) के मुताबिक, 15-19 साल की 6.8% लड़कियां या तो गर्भवती थीं या उन्होंने बच्चे को जन्म दिया था. यानी 100 में से 93 लड़कियां इस उम्र में गर्भवती नहीं हैं।
इससे भी अहम बात है कि किशोर गर्भावस्था की दर लगातार घट रही है. NFHS-3 में यह 16% थी, NFHS-4 में घटकर 7.9% हुई और NFHS-5 में और घटकर 6.8% पर आ गई. यानी पिछले 15 सालों में यह आंकड़ा आधे से भी ज्यादा घट चुका है।
संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (UNFPA) 2025 के डेटा के मुताबिक, भारत में किशोर प्रजनन दर 14.1 प्रति 1000 है. यानी 15-19 साल की 1,000 लड़कियों में से 14 गर्भवती होती हैं. दूसरे देशों से तुलना करें तो चीन में यह 6.6, श्रीलंका में 7.3 और थाईलैंड में 8.3 है.राज्यपाल का बयान 'हर लड़की' या 'ज्यादातर लड़कियों' की बात करता है, जबकि हकीकत यह है कि यह 6-7% लड़कियों का मामला है और यह आंकड़ा लगातार घट रहा है।
उत्तर प्रदेश का क्या हाल है?
आनंदीबेन पटेल उत्तर प्रदेश की राज्यपाल हैं और उन्होंने बयान भी वहीं दिया, तो देखते हैं UP के आंकड़े।
हाल ही में जारी NFHS-6 (2024-25) के मुताबिक, उत्तर प्रदेश में 15-19 साल की लड़कियों में किशोर गर्भावस्था की दर 3.5% है. NFHS-5 में यह 4% थी. यानी UP में यह दर राष्ट्रीय औसत (6.8%) से काफी कम है और इसमें गिरावट भी आ रही है।
दिलचस्प बात यह है कि NFHS-6 रिपोर्ट में UP में किशोर गर्भावस्था बढ़ने (2.9% से 3.5%) की बात भी कही गई है, लेकिन यह सर्वेक्षण पद्धति या नमूने में बदलाव की वजह से है, क्योंकि दूसरे आंकड़ों में गिरावट दिख रही है. यानी UP में भी किशोर गर्भावस्था राष्ट्रीय औसत से कम है और घट रही है।
तो फिर राज्यपाल ने ऐसा क्यों कहा?
राज्यपाल ने अपने बयान में 'सरकार पर बोझ' और 'पराक्रम' जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया. उन्होंने सीधे तौर पर लड़कियों को 'ऐसा पराक्रम मत करिए' कहकर नसीहत दी. राज्यपाल ने छात्रों से बहुत अनौपचारिक अंदाज में बात की. उन्होंने अपने बेटे का उदाहरण देते हुए कहा कि वे लव मैरिज की विरोधी नहीं हैं, बल्कि आत्मनिर्भर होने के बाद ही शादी करने की सलाह दे रही हैं. हालांकि, यह बयान दो मोर्चों पर गलत है।
गलत फैक्ट्स: जैसा कि ऊपर दिखा, किशोर गर्भावस्था आम बात नहीं है. यह 6-7% लड़कियों का मामला है और लगातार घट रहा है. राज्यपाल ने इसे 'सामान्य घटना' की तरह पेश किया।
संवेदनशीलता के लिहाज से: किशोर गर्भावस्था अक्सर बाल विवाह, सामाजिक-आर्थिक पिछड़ापन, शिक्षा की कमी और यौन शोषण से जुड़ी होती है. NFHS-5 के आंकड़े बताते हैं कि बिना शिक्षा वाली लड़कियों में किशोर गर्भावस्था 19.2% है, जबकि ज्यादा पढ़ी-लिखी लड़कियों में यह सिर्फ 2.9% है।
राज्यपाल ने सरकार पर बोझ की बात कही, जो कहीं न कहीं सही है. किशोरी स्वास्थ्य कार्यक्रम, सेक्स एजुकेशन और गर्भनिरोधकों को बढ़ाने जैसी सरकारी योजनाएं इस समस्या को कम करने में अहम भूमिका निभाती हैं. फिर भी इसकी जिम्मेदारी सिर्फ सरकार की नहीं है. इसमें परिवार, समाज और शिक्षा व्यवस्था की भी बड़ी भूमिका है।
तो क्या इसमें गलती लड़कियों की है?
एक्सपर्ट्स कहते हैं कि यह लड़कियों की 'गलती' नहीं है, बल्कि सामाजिक-आर्थिक फर्क, शिक्षा की कमी और संसाधनों तक पहुंच की कमी का नतीजा है. राज्यपाल का बयान इस जटिल मुद्दे को 'लड़कियों की लापरवाही' की तरह पेश करता है. वहीं, एक सच्चाई यह भी है कि किशोर गर्भावस्था की समस्या पूरी तरह खत्म नहीं हुई है।
गुजरात के मेहसाणा जिले में अप्रैल से दिसंबर 2025 के बीच 341 नाबालिग लड़कियां गर्भवती पाई गईं, जिनमें 2 की उम्र सिर्फ 14 साल थी।
सोर्स :: एबीपी न्यूज़
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