246 वर्ष के पहले से चली आ रही है सावन के सोमवार में बाबा विश्वनाथ की यह परंपरा...
वाराणसी, न्यूज। श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर में कुछ ही अवसर होते हैं जब गर्भगृह में ज्योतिर्लिंग की बजाय स्वरूप के दर्शन होते हैं। सावन के सोमवार भी उन अवसरों में शामिल हैं। आप बाबा के विविध स्वरूपों का दर्शन करना चाहते हैं तो रात में धाम आएं। प्रत्येक सोमवार सिर्फ दो घंटे स्वरूप दर्शन होंगे। दो घंटे की यह अवधि सायंकाल की सप्तर्षि आरती के बाद से शयन आरती आरंभ होने यानी रात आठ बजे से रात्रि 10 बजे तक होगी।
सावन के सोमवार को सप्तर्षि आरती आठ बजे पूरी हो जाएगी। ऐसे में रात्रि आठ से 10 बजे तक इन स्वरूपों के दर्शन होंगे। विश्वनाथ मंदिर के पूर्व महंत परिवार के वरिष्ठ सदस्य पं. ज्योतिशंकर त्रिपाठी के अनुसार रानी अहिल्याबाई के 246 वर्ष पूर्व मंदिर का जीर्णोद्धार कराने के पहले से सावन के सोमवार को बाबा के स्वरूप दर्शन की परंपरा चली आ रही है।
स्वरूप महात्म्य
इस वर्ष प्रथम सोमवार, तीन अगस्त को गर्भगृह में बाबा विश्वनाथ शिव स्वरूप में दर्शन देंगे। 10 अगस्त, दूसरे सोमवार को शंकर-पार्वती की रजत प्रतिमा का दर्शन होगा। 17 अगस्त, तीसरे सोमवार पर भगवान शिव अर्द्धनारीश्वर स्वरूप में दर्शन देंगे। 24 अगस्त को बाबा का रुद्राक्ष शृंगार किया जाएगा। दर्शन के लिए शिव की पंचवदन प्रतिमा रखी जाएगी।
शिव का स्वरूप
आदि योगी ने शिव का रूप सप्तर्षियों को दीक्षित करने के लिए धारण किया था। इस स्वरूप में उन्होंने सप्तर्षि अर्थात् पुलस्थ, पुलह: क्रतु, अंगिरा, अत्रि, वशिष्ठ एवं अरुंधति को उन 132 विधानों का ज्ञान दिया जिनके अनुपालन से मानव जीवन की तमाम समस्याओं का निराकरण होता है।
अर्द्धनारीश्वर
सप्तर्षियों को जो ज्ञान महादेव ने दिया, उन्हीं 132 विधानों की अनुभूति देवी पार्वती को कराने के लिए प्रभु ने पार्वती को स्वयं में समाहित कर लिया था। इससे पूर्व पार्वती ने यह प्रश्न उठाया था कि 132 विधान ही क्यों? तपस्या करने के बाद भी वह नहीं जान सकीं। तब शिव ने अर्द्धनारीश्वर स्वरूप धारण किया।
शंकर-पार्वती
शंकर-पार्वती की युगल छवि को वैराग्य और दाम्पत्य के बीच समन्वय का प्रतीक माना गया है। यह स्वरूप प्रकृति और पुरुष के संयमित एवं आदर्श स्थिति को भी दर्शाता है। देवाधिदेव इस स्वरूप के माध्यम से संसारियों को आदर्श जीवन सूत्र भी उपलब्ध कराते हैं।
रुद्राक्ष शृंगार
सावन के अंतिम सोमवार (इस वर्ष चौथे) आदि योगी शिव की चल रजत प्रतिमा विश्वनाथ मंदिर के गर्भगृ़ह में स्थान लेती है। भगवान के विग्रह से लेकर गर्भगृह और मंदिर के मुख्य मंडप को रुद्राक्ष से सजाया जाता है। रुद्राक्ष को शिव की आंख कहा गया है। इसकी उत्पत्ति जुड़ी कई कथाएं हैं।