भारत का 64 साल पहले खोया जमीन का वो 'कीमती टुकड़ा', जिस पर कुंडली मारकर बैठा है 'ड्रैगन'; अब गंवाए जाने के खौफ से परेशान...
Why China does not want to give up Longju Area? क्या चीन इंच-प्रति इंच आगे बढ़ते हुए भारत के इलाकों पर कब्जा करता जा रहा है? क्या उसने अरुणाचल प्रदेश के लोंगजू (Longju) नामक स्थान को अपने कब्जे में ले लिया है?सोशल मीडिया पर अरुणाचल प्रदेश से जुड़े इस तरह के दावों को सरकार ने खारिज कर दिया है। सूत्रों के अनुसार, भारतीय सेना और भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) सीमा पर अपना दबदबा बनाए रखने के लिए पूरी तरह मुस्तैद हैं. वे बारीकी से चीन की हर हलचल पर पैनी नजर बनाए हुए हैं. साथ ही, सरहद पार के इलाके में ड्रैगन की ओर से किए जा रहे बदलावों को भी बारीकी से नोटिस कर रहे हैं।
क्या चीन ने वाकई लोंगजू को अपने कब्जे में ले लिया?
असल में अरुणाचल प्रदेश में रहने वाले एक व्यक्ति ने सोशल मीडिया पर पोस्ट करके दावा किया कि वह जल्द ही भारतीय कहलाने का अधिकार खोकर चीनी बन जाएगा. उसके इलाके लोंगजू को चीन ने अपने कब्जे में ले लिया है और वह धीरे-धीरे आगे बढ़ता जा रहा है. इसके बाद से लोंगजू स्थान चर्चा में आ गया है. जिस पर अब सरकार ने स्थिति स्पष्ट की है. अब हम आपको लोंगजू के बारे में डिटेल में बताते हैं।
असल में लोंगजू (Longju) अरुणाचल प्रदेश के ऊपरी सुबनसिरी जिले की सीमा पर बसा एक अहम पहाड़ी क्षेत्र है. यह क्षेत्र सुबनसिरी नदी घाटी के पास स्थित है. भारत और तिब्बत को बांटने वाली मैकमोहन रेखा (McMahon Line) इसके ठीक पास से होकर गुजरती है।
इतना खास क्यों है लोंगजू?
यह क्षेत्र हिमालय की ऊंची चोटियों और घने जंगलों से घिरा हुआ है. ऊंचाई पर मौजूद होने की वजह से इस क्षेत्र से तिब्बत की ओर जाने वाले प्राकृतिक पहाड़ी रास्तों पर सीधी नजर रखी जा सकती है. इसकी यही स्थिति इसे रणनीतिक लोकेशन बनाती है. कई किलोमीटर के दायरे में फैले इस इलाके की सरहद तिब्बत के ल्होंत्से (Lhuntse) के साथ मिलती है।
भारत-चीन में हो चुकी है सैन्य झड़प
इस जगह को लेकर भारत और चीन के बीच हिंसक झड़प हो चुकी है. चीन की पीपुल्स लिब्रेशन आर्मी (PLA) ने 25 अगस्त 1959 को लोंगजू में बनी असम राइफल्स की अग्रिम चौकी पर अचानक हमला कर दिया था. उस समय भारत ऐसी स्थिति के लिए तैयार नहीं था और लोंगजू में बहुत कम संख्या में सैनिक-हथियार थे. लिहाजा भारत के सैनिकों को शहादत झेलनी पड़ी और चीन ने इस चौकी पर अपना अवैध कब्जा कर लिया था. यह 1950 के दशक में भारत-चीन सीमा पर हुई पहली बड़ी सशस्त्र सैन्य झड़प थी, जिसने दोनों देशों के रिश्तों में कड़वाहट घोल दी थी.इसके बाद हालात संभालने के लिए दोनों देशों के बीच 1960 में वार्ताओं का दौर शुरू हुआ. अपना अपर हैंड देखते हुए चीन ने अरुणाचल प्रदेश को 'दक्षिण तिब्बत' बताते हुए इसके लगभग 69,000 वर्ग किलोमीटर इलाके पर अपना दावा ठोक दिया. भारत ने उसके दावे को सिरे से खारिज कर दिया. उसने साफ किया कि अरुणाचल प्रदेश भारत का अभिन्न और अटूट अंग है।
वर्ष 1962 में चीन ने अचानक कर दिया हमला
चीन ने भारत के इस फैसले के बाद फिर से धोखा देने की चाल चली. उसने अक्तूबर 1962 में अचानक भारत के खिलाफ अरुणाचल और लद्दाख सेक्टर में हमला कर दिया. 1959 में एक चौकी गंवाने के बावजूद भारत की तत्कालीन जवाहर लाल नेहरू की सरकार ने अपनी सैन्य तैयारियों को मजबूत नहीं किया था. इसका फायदा उठाकर चीन की सेना कामेंग, सुबनसिरी, सियांग और लोहित घाटियों में अंदर तक घुस गई थी।
इसके बाद जब अमेरिका ने हस्तक्षेप का संकेत दिया तो चीनी सेना एकतरफा युद्धविराम की घोषणा कर मैकमोहन रेखा के उत्तर में वापस लौट गई. हालांकि, उसने जीते गए लोंगजू पर से अपना कब्जा नहीं छोड़ा. यह उन चुनिंदा इलाकों में से एक था, जिसे चीन ने 1959 के कब्जे के बाद से कभी खाली नहीं किया. उसके बाद से यह आज तक लगातार चीन के कब्जे में है।
पीछे हटने के बावजूद चीन ने लोंगजू पर दावा क्यों नहीं छोड़ा?
सवाल ये है कि जब 1962 के युद्ध में चीनी सेना असम के मैदानी इलाकों तक पहुंचने के बाद पीछे हट गई तो उसने लोंगजू जैसे कुछ खास बिंदुओं पर अपना नियंत्रण नहीं छोड़ा. असल में इसके पीछे कई रणनीतिक वजहें हैं, जिन्हें हमें समझना होगा।
पहली वजह ये है कि लोंगजू क्षेत्र सुबनसिरी नदी घाटी के प्रवेश द्वार पर स्थित है. लिहाजा इस जगह पर कब्जा रखकर चीन तिब्बत से भारत के आंतरिक इलाकों की तरफ जाने वाले प्राकृतिक रास्तों पर नियंत्रण रख सकता है. दूसरी बात, यह क्षेत्र आसपास के इलाकों की तुलना में ज्यादा ऊंचाई पर है. लिहाजा इस पर कब्जा करके वह अपने तिब्बत के दक्षिण क्षेत्र को भारतीय निगरानी से भी सुरक्षित कर पाता है. तीसरी वजह है कि लोंगजू पर कब्जा बनाए रखकर चीन, भारत पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाता है कि मैकमोहन रेखा विवादित है, जिसे वह नहीं मानता है।
क्यों डरता है चीन?चीन की सेना के लिए भी लोंगजू बेहद संवेदनशील स्थान है. इस इलाके की पहाड़ियों पर चीन ने अपनी सैन्य चौकियां बना रखी हैं. वे इनकी मदद से नीचे भारतीय इलाके की तरफ सीधी नजर रखती हैं. ऐसा करके वे भारत की किसी भी सैन्य आवाजाही को हर समय मॉनिटर करती रहती है।
चीन ने लोंगजू के ठीक पीछे तिब्बत के ल्होंत्से और त्सारी (Tsari) क्षेत्रों में हाईवे, रेल नेटवर्क और सैन्य ठिकाने बनाए हैं. ऐसे में वह लोंगजू को इन बुनियादी ढांचों के लिए एक बफर जोन के रूप में यूज करता है. यानी अगर भारत कभी तिब्बत में चीन के सैन्य ठिकानों पर हमला करता हो लोंगजू में बने सैन्य ठिकानों के जरिए उसे रोका जा सकेगा।
अगर यह क्षेत्र चीन के हाथ से निकला तो क्या होगा?
चीन को सबसे ज्यादा डर इस बात से लगता है कि अगर भारत लोंगजू पर अपना नियंत्रण वापस हासिल कर लेता है तो चीन के लिए कई सुरक्षा चुनौतियां खड़ी हो जाएंगी. ऐसी स्थिति में ल्हासा-न्यिंगची-सिक्किम को जोड़ने वाले चीनी रेल और रोड नेटवर्क सीधे भारतीय आर्टिलरी पहुंच में आ जाएंगे और वह जब चाहे, चीन की बखिया उधेड़ सकता है।
केवल यही खतरा नहीं है. चीन को इस बात का भी भय है कि लोंगजू पर भारत के अधिकार से अरुणाचल प्रदेश पर चीन के काल्पनिक दावों की हवा निकल जाएगी. इस घटना से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी यह साबित हो जाएगा कि 1959 का चीनी कब्जा अवैध था।
सरहदी इलाके में तेजी से कर रहा विकास
इसी आशंका की वजह से चीन ने हाल के वर्षों में लोंगजू और सुबनसिरी नदी के तट पर बड़े पैमाने पर निर्माण कार्य किया है. उसने लोंगजू के करीब विवादित इलाके में 'सैनिक-नागरिक दोहरे उपयोग' वाले आधुनिक 'शाओकांग' (Xiaokang) गांवों का निर्माण किया है. इन गांवों में सेना के रिटायर्ड लोगों को नागरिकों के रूप में बसाया गया है, जो चीन की अग्रिम चौकियों के नाक-कान के रूप में काम करते हैं।
भारत के हमले के डर से चीन ने ल्होंत्से से लोंगजू तक हर मौसम में काम करने वाली पक्की सड़कें बना ली हैं. उसने सुबनसिरी नदी पर पुल भी बना लिए हैं. जिसकी वजह से चीनी सेना (PLA) कुछ ही घंटों में भारी सैन्य हथियार और रसद अग्रिम मोर्चे तक पहुंच सकेगी।
भारत भी तेजी से बढ़ा रहा अपनी तैयारियां
चीन की चुनौतियों से निपटने के लिए भारत ने भी पिछले कुछ वर्षों में तेजी से सरहद पर अपनी ढांचागत सुविधाएं मजबूत की हैं. सरहद के आसपास सड़कों का जाल बिछाया गया है. पहाड़ों के नीचे टनल बनाई जा रही हैं. रेलवे लाइन बिछाने के लिए सर्वे किए जा रहे हैं. हेलीपैड और हवाई पट्टियों का विस्तार किया जा रहा है। नई सैन्य छावनियां बनाई जा रही हैं. ब्रह्मोस, रफाल जैसे घातक हथियारों को तैनात किया जा रहा है. जिससे भविष्य में चीन के साथ होने के वाले किसी भी संघर्ष में उसके न केवल दांत खट्टे किए जा सकें बल्कि अपनी खोई हुई जमीन को वापस भी लिया जा सके।