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वाराणसी से उठी गुलामी की न‍िशानी को म‍िटाने की आवाज, कारोबार‍ियों की इस मांग ने पकड़ा जोर...

वाराणसी से उठी गुलामी की न‍िशानी को म‍िटाने की आवाज, कारोबार‍ियों की इस मांग ने पकड़ा जोर...

वाराणसी, केसरी न्यूज 24। शहर के व्यापारियों और उद्यमियों ने सरकारी राजस्व अभिलेखों से ''केसर-ए-हिंद'' (ब्रिटिश भारत का सम्राट) जैसे औपनिवेशिक शब्दों को हटाने की मांग की है। व्यापारियों का कहना है कि यह केवल एक प्रशासनिक सुधार का विषय नहीं है, बल्कि यह देश की ऐतिहासिक चेतना, सांस्कृतिक अस्मिता और स्वतंत्र भारत की गरिमा से जुड़ा महत्वपूर्ण प्रश्न भी है।

वाराणसी के पराडकर भवन में मालवीय मार्केट व्यावसायिक संघ एवं शरणार्थी व्यापार महामंडल, काशी की ओर से आयोजित परिचर्चा में व्यापारियों ने कहा कि कोतवाली थाना जिस आराजी संख्या पर दर्ज है, उसके राजस्व रिकॉर्ड में आज भी ब्रिटिश शासन काल का ''केसर-ए-हिंद'' शब्द अंकित है। स्वतंत्रता प्राप्ति के दशकों बाद भी ऐसे औपनिवेशिक उल्लेखों का बने रहना प्रशासनिक अभिलेखों के समयानुकूल अद्यतन ना होने की ओर संकेत करता है।

मालवीय मार्केट व्यावसायिक संघ के अध्यक्ष अभिषेक केसरी ने परिचर्चा का संचालन करते हुए कहा कि पिछले दिनों पूर्व मंत्री शतरुद्र प्रकाश ने इस मुद्दे को उठाया था और प्रशासन को पत्र भेजकर सुधार की मांग की थी। लेकिन अभी तक प्रशासनिक स्तर पर अपेक्षित कार्यवाही नहीं हो सकी है। उन्होंने कहा कि यह शब्द ब्रिटिश साम्राज्य और औपनिवेशिक शासन की याद दिलाता है, इसलिए इसे राजस्व रिकॉर्ड से हटाकर वर्तमान संवैधानिक व्यवस्था के अनुरूप संशोधित किया जाना चाहिए।

बनारस बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष धीरेंद्र नाथ शर्मा ने कहा कि वाराणसी की कोतवाली केवल एक थाना नहीं, बल्कि काशी की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान का भी प्रतीक है। जनमान्यता के अनुसार काशी के कोतवाल भगवान काल भैरव हैं और कोतवाली परिसर में उनकी प्रतिमा स्थापित है, जिसकी नियमित पूजा-अर्चना भी होती है। ऐसे महत्वपूर्ण स्थल से जुड़े सरकारी अभिलेखों में औपनिवेशिक शब्दों का बने रहना कई लोगों को असंगत प्रतीत होता है।

व्यापारियों विनय अरोड़ा, धीरज अरोड़ा और ऋषि आहूजा ने कहा कि किसी भी सरकारी रिकॉर्ड में संशोधन विधिक प्रक्रिया और प्रामाणिक अभिलेखों के आधार पर ही किया जाता है। यदि संबंधित राजस्व रिकॉर्ड में वास्तव में ऐसे शब्द दर्ज हैं, तो प्रशासन को उनकी वैधानिक समीक्षा कर आवश्यक कार्रवाई करनी चाहिए। साथ ही, किसी भी परिवर्तन से पहले संबंधित विभागों द्वारा तथ्यों का सत्यापन और निर्धारित नियमों का पालन आवश्यक होगा।

पत्रकार संघ के अरुण मिश्रा ने कहा कि आजादी केवल राजनीतिक परिवर्तन का नाम नहीं, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था, अभिलेख और सार्वजनिक संस्थानों में भी स्वतंत्र भारत की पहचान को स्थापित करने की सतत प्रक्रिया है। ऐसे में यदि कहीं औपनिवेशिक काल के प्रासंगिक प्रतीक अभी सरकारी दस्तावेजों में मौजूद हैं, तो उनका विधि सम्मत पुनरीक्षण समय की मांग है।

व्यापारियों की यह मांग सामाजिक सोच का हिस्सा है कि सरकारी अभिलेख वर्तमान भारत की संवैधानिक भावना, सांस्कृतिक विरासत और राष्ट्रीय स्वाभिमान के अनुरूप हों। अब यह जिला प्रशासन पर निर्भर करेगा कि वह इस विषय की जांच कर नियमानुसार उचित निर्णय ले, ताकि ऐतिहासिक अभिलेख की शुद्धता और वर्तमान प्रशासनिक व्यवस्था दोनों का संतुलन बना रहे।