काशी के 'समय बैंक' में बुजुर्गों को मिल रहा सुरक्षित भविष्य का सहारा, 26 रिटायर्ड लोग संवार रहे अपना कल...
वाराणसी, न्यूज। पैसा जमा करके भविष्य सुरक्षित करने की बात तो सबने सुनी है, लेकिन वाराणसी के अपना घर आश्रम ने अब 'समय' को ही भविष्य निधि बना दिया है। यहां शहर के 26 सेवानिवृत्त लोग बतौर सेवादार जुड़े हैं, जो काशी के सामने घाट स्थित अपना घर आश्रम में रह रहे बेसहारा बुजुर्गों (प्रभुजनों) की देखभाल, उन्हें अस्पताल ले जाने, उनके साथ बैठकर बातचीत करने और भोजन वितरण आदि की जिम्मेदारियां निभा रहे हैं।
आर्थिक रूप से समृद्ध इन लोगों के पास बात करने और सुनने वाला कोई नहीं था, इसलिए इन्होंने सेवा को सहारा बना लिया। अब इनकी यह सेवा ही घंटे (टाइम क्रेडिट) के रूप में इनके खाते में जमा हो रही है। यह घंटे जरूरत पड़ने पर बोनस के साथ इन्हें वापस मिलेंगे।
गंगा तट पर मदरवां सामने घाट स्थित अपना घर आश्रम की शुरुआत 2018 में हुई थी। समय के साथ बुजुर्गों की संख्या बढ़ती गई तो संस्था के संचालक डॉ. कुमार निरंजन को चिंता सताने लगी कि आखिर इतने लोगों की देखभाल कैसे सुनिश्चित हो। इसी सोच से समय बैंक की परिकल्पना सामने आई।
मानवीय सुरक्षा की भी जरूरत
डॉ. निरंजन का मानना है कि आज के दौर में अकेलापन, सामाजिक विखंडन और पारिवारिक दूरी गंभीर चुनौती बनती जा रही है। ऐसे समय में सिर्फ आर्थिक सुरक्षा नहीं, बल्कि मानवीय सुरक्षा की भी आवश्यकता है। समय बैंक इसी दिशा में सकारात्मक प्रयास है, जहां सेवा को सम्मान, सहयोग को सुरक्षा और समय को सामाजिक पूंजी का दर्जा दिया गया है।
डॉ. कुमार निरंजन बताते हैं कि बच्चे पढ़-लिखकर विदेश या बड़े शहरों में बस जाते हैं। करियर और नौकरी की मजबूरियां उन्हें घर से दूर ले जाती हैं और पीछे रह जाते हैं अशक्त, अकेले मां-बाप। लेकिन अब बुजुर्ग इन परिस्थितियों में खुद को असहाय समझने के बजाय बच्चों पर निर्भरता का विचार पीछे छोड़कर आगे बढ़ रहे हैं। आश्रम में सेवा दे रहे निर्मल चौधरी के दोनों बेटे अमेरिका में बसे हैं। वह बताते हैं कि खुद और पत्नी के भविष्य की चिंता करते हुए उन्होंने आश्रम में सेवा देनी शुरू की, जिससे वह व्यस्त और स्वस्थ भी रहें और अंतिम समय में किसी पर निर्भरता भी नहीं रहेगी। अरविंद अग्रवाल की सिर्फ बेटियां हैं, जो अपने ससुराल की जिम्मेदारियों में व्यस्त हैं।
ऐसे में उन्होंने भी अपने आने वाले कल के लिए खुद सेवा का रास्ता चुना है। बैंक से सेवानिवृत्त शरद कबीर के लिए यह सिर्फ भविष्य की तैयारी नहीं, बल्कि 'नर सेवा ही नारायण सेवा' का भाव है। वह अपना समय आश्रम की सेवा में सहर्ष अर्पित करते हैं।
दुनिया में पहले से आजमाया जा चुका है यह मॉडल
समय बैंक की अवधारणा दुनिया के कई देशों में पहले से है। स्विट्जरलैंड, ब्रिटेन, अमेरिका, जापान, चीन जैसे कई देशों में लोग बुजुर्गों व जरूरतमंदों की सेवा में अपना समय देते हैं, ताकि खुद के बुढ़ापे में उन्हें भी उसी तरह की सेवा वापस मिल सके। अपना घर आश्रम ने इसी अवधारणा को भारतीय संदर्भ में उतारने की कोशिश की है, जहां अनाथालय या वृद्धाश्रम में सेवा देकर लोग अपना समय अर्जित करते हैं और भविष्य में जरूरत पड़ने पर वही सेवा प्राप्त कर सकेंगे।
इस तरह काम करेगा समय बैंक
कोई भी व्यक्ति इस बैंक से जुड़कर प्रभुजनों की सेवा, देखभाल, अस्पताल ले जाने में सहयोग, साथ बैठने, बातें करने, भोजन वितरण अथवा पुनर्वास जैसे कार्यों में जितना समय देगा, उतना समय उसके खाते में भविष्य निधि की तरह सुरक्षित जमा होता रहेगा। आगे चलकर जब भी उस व्यक्ति को सहायता, साथ, देखभाल, अस्पताल ले जाने या उपचार में सहयोग की जरूरत पड़ेगी, तो जमा किए गए समय के अनुरूप उसे अधिकार के रूप में सेवा मिलेगी।
खाता खोलने के लिए सदस्य को आधार कार्ड या पहचान पत्र, मोबाइल नंबर और एक स्थानीय परिचित का विवरण देना होगा। सत्यापन के बाद सेवा की उपस्थिति बायोमेट्रिक या डिजिटल प्रणाली के जरिए पासबुक में दर्ज होगी। महिला-पुरुष दोनों इससे जुड़ सकेंगे और सदस्यों की गरिमा को ध्यान में रखते हुए उनका नाम गोपनीय रखा जाएगा। फिलहाल यह व्यवस्था सिर्फ वाराणसी के लिए है, ताकि जरूरत पड़ने पर सेवा तुरंत उपलब्ध कराई जा सके।
नए भवन में बनेंगे 25 विशेष कमरे
गंगा तट पर बन रहे अपना घर आश्रम के नवीन भवन में समय बैंक के सदस्यों के लिए अलग से 25 आधुनिक सुविधायुक्त कमरे बनाए जाएंगे। अपना घर आश्रम की यह कोशिश केवल एक योजना भर नहीं, बल्कि उस बदलते समाज को आईना दिखाने वाली पहल है, जहां कई बार बुजुर्गों के पास घर तो होता है पर अपनापन नहीं। संपत्ति होती है पर सहारा नहीं। शायद यही वजह है कि हर बुजुर्ग को दवा से पहले चाहिए बस एक आत्मीय आवाज-'बाबा, आप कैसे हैं?'