'NDPS केस में जब्त निजी जेवर मालखाने में रखना न्यायहित में नहीं', इलाहाबाद HC ने वाराणसी की अदालत का आदेश रद किया...
प्रयागराज, न्यूज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि एनडीपीएस एक्ट में जब्त निजी जेवर अनावश्यक रूप से वर्षों तक मालखाने में रखना जनहित और न्यायहित में नहीं है। कोर्ट को उसका फोटो-पंचनामा तैयार कराकर वास्तविक स्वामी को मुचलके पर रिलीज कर देना चाहिए।'
याची की अर्जी महीने भर में निस्तारित करे अदालत'
इस टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति डॉ. गौतम चौधरी की एकलपीठ ने वाराणसी के संदीप इंद्रजीत तिवारी की याचिका स्वीकार कर ली है। निर्देश दिया है कि सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुसार अधीनस्थ अदालत याची की अर्जी महीने भर में निस्तारित करे।
याची पर एनडीपीएस एक्ट के तहत दर्ज है केस
याची के खिलाफ एनडीपीएस एक्ट के तहत थाना एनसीबी लखनऊ जोन वाराणसी में मुकदमा दर्ज है। पुलिस ने चार अगस्त 2023 को याची को गिरफ्तार किया था। जामा तलाशी में उससे स्वर्ण चेन मय पेंडेंट, तीन स्वर्ण अंगूठियां, गोल्ड ब्रेसलेट और 850 रुपये बरामदगी दिखाई गई। उसी दिन जमा-तलाशी फर्द भी तैयार हुई।
अपर जिला व सत्र न्यायाधीश कोर्ट ने अर्जी खारिज की
याची ने 23 मई 2025 को वाराणसी की अदालत में अर्जी देकर कहा कि ये वस्तुएं केस प्रापर्टी नहीं हैं, इन पर कोई अन्य दावेदार भी नहीं है। पत्नी द्वारा खरीदे गए जेवर का एस्टीमेट भी पेश किया। एनसीबी उपनिरीक्षक ने आपत्ति दाखिल कर आशंका जताई कि यह वस्तुएं मादक पदार्थों की अवैध बिक्री से अर्जित लाभ से खरीदी गई हो सकती हैं। अपर जिला व सत्र न्यायाधीश कोर्ट नंबर 14 ने तीन जुलाई 2025 को याची के जेवरों को रिलीज करने की अर्जी इसी आशंका पर खारिज भी कर दी। इस आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी गई।
दोनों पक्षों को सुनकर कोर्ट ने कहा...
दोनों पक्षों को सुनने के बाद पीठ ने कहा- ट्रायल कोर्ट ने स्वामित्व संबंधी दस्तावेजों पर विचार ही नहीं किया। सिर्फ जांच एजेंसी की मौखिक आशंका पर किसी व्यक्ति को उसकी व्यक्तिगत जमातलाशी की वस्तुओं के उपभोग से वंचित रखना उचित नहीं है। आज तक उन वस्तुओं पर किसी अन्य व्यक्ति ने दावा भी नहीं किया है।याची को ट्रायल कोर्ट में फिर अर्जी देने का आदेश
इस क्रम में कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले सुंदरभाई अंबालाल देसाई बनाम गुजरात राज्य (2003) का हवाला देते हुए कहा कि संपत्ति के निस्तारण के अधिकार का प्रयोग शीघ्रता और विवेकपूर्ण तरीके से होना चाहिए, उसे लंबे समय तक थाने में रखना उपयोगी नहीं है। कोर्ट ने याची को स्वतंत्रता दी है कि वह फैसले की तिथि से एक माह के भीतर स्वामित्व दर्शाने वाले दस्तावेजों के साथ ट्रायल कोर्ट में फिर से उचित अर्जी दे।