यूपी : 'अब हमें कौन खिलाएगा मां', 74 साल की 'रामबेटी' की अर्थी के आगे आंखें भिगोए चले दो हाथी, रो पड़ा पूरा संभल...
संभल, न्यूज। उत्तर प्रदेश के संभल में अर्थी उठी, तो घर का आंगन रो पड़ा, लेकिन इस आखिरी सफर की सबसे भावुक तस्वीर तब सामने आई, जब इंसानों के साथ दो हाथी भी अपनी मालकिन को विदा करने निकल पड़े। 74 साल की रामबेटी देवी की अर्थी के आगे उनके पालतू हाथी परमा और मोहन चलते रहे। पीछे सैकड़ों वाहन, झांकियां और हजारों लोगों का हुजूम था। यह नजारा जिसने भी देखा, कुछ पल के लिए ठिठक गया।
संभल जिले के रजपुरा क्षेत्र के ब्यौरा गांव से बुधवार को रामबेटी की अंतिम यात्रा निकली। करीब 15 किलोमीटर दूर राजघाट गंगा तक पहुंची इस यात्रा में 12 गांवों के करीब डेढ़ हजार लोग शामिल हुए। बराला कस्बे से गुजरते वक्त हाथियों को देखने के लिए लोगों की भीड़ जुट गई और करीब 25 मिनट तक यातायात थम गया।
शुगर की बीमारी से जूझ रही थीं रामबेटी देवी
रामबेटी देवी पिछले आठ साल से शुगर की बीमारी से जूझ रही थीं। तीन दिन पहले हालत बिगड़ने पर उन्हें अलीगढ़ के निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया था। बुधवार तड़के करीब चार बजे उनका निधन हो गया। इसके बाद बेटों मनवीर और चरन सिंह ने मां की अंतिम विदाई को उसी सम्मान के साथ देने का फैसला किया, जिसकी वह हकदार थीं।
हाथी परमा और मोहन शामिल
हाथी परमा और मोहन के लिए रामबेटी सिर्फ मालकिन नहीं थीं। बेटों के मुताबिक, 2012 में पिता के निधन के बाद मां ने दोनों हाथियों की देखभाल की। उनकी सेवा और लगाव ऐसा था कि दोनों परिवार के सदस्यों की तरह हो गए, इसलिए मां की अर्थी उठी, तो दोनों को भी अंतिम यात्रा में शामिल किया गया।
खाना-पीना छोड़ा
सबसे ज्यादा भावुक करने वाली बात यह रही कि मालकिन की मौत के बाद दोनों हाथी गुमसुम हैं और खाना-पीना छोड़ बैठे हैं। बेटों का कहना है कि मां के साथ उनका वर्षों पुराना रिश्ता था, इसलिए उनके जाने का असर दोनों पर साफ दिखाई दे रहा है।
200 साल से हाथियों के साथ रिश्ताइस परिवार का हाथियों से रिश्ता भी करीब 200 साल पुराना बताया जाता है। मनवीर के मुताबिक, उनके पूर्वजों के समय से हाथी पालने की परंपरा चली आ रही है। मौजूदा दोनों हाथी करीब 78 साल के हैं।
श्रीकृष्ण और शिवाजी की झांकियों के बीच आगे बढ़ते परमा-मोहन और पीछे चलती रामबेटी की अर्थी ने एक ऐसी तस्वीर रच दी, जिसे संभल शायद लंबे समय तक नहीं भूलेगा। मां चली गईं, मगर उनके साथ चलने वाले दो परिवार के सदस्य आज भी जैसे उनकी राह देख रहे हैं।