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बिहार MLC चुनाव परिणाम: सवर्ण उम्मीदवारों के प्रदर्शन ने राजनीतिक दलों को सोचने के लिए मजबूर कर दिया...

बिहार MLC चुनाव परिणाम: सवर्ण उम्मीदवारों के प्रदर्शन ने राजनीतिक दलों को सोचने के लिए मजबूर कर दिया...

पटना, ब्यूरो। बिहार विधान परिषद की आठ सीटों के चुनाव परिणाम ने राज्य की राजनीति में जातीय समीकरणों को लेकर नई चर्चा शुरू कर दी है। शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों में अलग-अलग दलों के उम्मीदवारों की जीत ने यह सवाल खड़ा किया है कि क्या सवर्ण मतदाताओं की राजनीतिक अहमियत को पार्टियां नए सिरे से समझेंगी?बिहार की राजनीति में पिछड़े और अति पिछड़े वर्गों की भूमिका पर लंबे समय से चर्चा होती रही है, लेकिन इन चुनावों में उम्मीदवारों की सामाजिक पहचान, व्यक्तिगत पकड़ और पार्टी से अलग उनकी स्वीकार्यता भी चर्चा के केंद्र में है।

8 में 6 सवर्ण, आंकड़ा क्या कहता है?

अब जरा एक नजर डालते हैं बिहार की आठ सीट पर जहां सवर्ण उम्मीदवार या तो जीते हैं या जीत की ओर अग्रसर हैं।

* पटना शिक्षक - डॉ. संजीव कुमार (RJD) सवर्ण, जीत
* पटना स्नातक - नीरज कुमार (JDU) सवर्ण, जीत
* दरभंगा शिक्षक - सुरेश राय (जन सुराज) सवर्ण, जीत
* दरभंगा स्नातक - सर्वेश कुमार (BJP) सवर्ण, आगे
* तिरहुत शिक्षक - डॉ. नरेंद्र सिंह (BJP) सवर्ण, जीत की ओर
* सारण शिक्षक - राहुल राज (निर्दलीय) सवर्ण, जीत
* तिरहुत स्नातक - वंशीधर ब्रजवासी (निर्दलीय) अतिपिछड़ा
* कोसी स्नातक - एनके यादव (BJP) ओबीसी

इस चुनाव से साफ है कि 8 में से 6 पर सवर्ण उम्मीदवार का दबदबा !! यह महज संयोग नहीं, बल्कि एक ट्रेंड है। दरअसल, बिहार की राजनीति में जातीय समीकरण हमेशा महत्वपूर्ण रहे हैं. लेकिन विधान परिषद चुनाव ने एक बार फिर दिखाया कि केवल जातीय पहचान या पार्टी का परंपरागत आधार जीत की गारंटी नहीं है. भाजपा से टिकट नहीं मिलने के बाद राहुल राज का निर्दलीय जीतना और पटना शिक्षक सीट पर राजद की सफलता इसके उदाहरण हैं।

पिछड़ों की राजनीति में सवर्णों ने दिया मैसेज

दरअसल, बिहार की राजनीति में सवर्ण वोटर की अहमियत कई राजनीतिक संकेत देती है. बिहार की राजनीति पिछड़ों के इर्दगिर्द घूमती है, ऐसे में कोई भी पार्टी खुलकर सवर्ण वोटरों को अहमियत नहीं देती दिखती है. लेकिन इस बार के एमएलसी चुनाव में जिस तरह से सवर्ण उम्मीदवार तमाम दलों ने उतारे और 8 में से 6 पर सवर्ण जीत गए, इससे साफ हो गया कि सवर्ण वोटरों ने तमाम राजनीतिक पार्टियों को संदेश दिया है कि बिहार की राजनीति में जो भी सवर्ण वोटरों को तवज्जो देगा, उसके लिए जीत का रास्ता आसान होगा।

प्रबुद्ध वोटर है सवर्ण, जाति-पार्टी नहीं देखता

बिहार के वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक संजय कुमार बताते हैं कि सवर्ण वोटर प्रबुद्ध माने जाते हैं और वो कोई भी फैसला सोच समझ कर करते हैं. न तो जाति देखते हैं और ना ही पार्टी. जिस उम्मीदवार से उन्हें उम्मीद होती है, उनको प्राथमिकता देते हैं और इस बार के एमएलसी चुनाव में यह शायद संयोग है कि सवर्ण वोटरों की प्राथमिकता जिन्हें भी मिली, उनमें से अधिकांश सवर्ण उम्मीदवार निकले. दरअसल, विधान परिषद चुनाव के नतीजे बिहार में जातीय राजनीति के खत्म होने का संकेत नहीं देते, बल्कि यह बताते हैं कि जाति के साथ उम्मीदवार की अपनी राजनीतिक ताकत भी मायने रखती है।

पटना शिक्षक सीट बनी मिसाल

संजय कुमार आगे बताते हैं कि सवर्ण वोटरों ने इस बार राजनीतिक दलों को एक बड़ा मैसेज भी दिया है कि उनके लिए कोई भी पार्टी अछूत नहीं है. जिस भी पार्टी ने सवर्णों को इज्जत और सम्मान दिया है, सवर्ण वोटर उनके पीछे खड़े हुए हैं और इसका बड़ा उदाहरण है पटना शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र, जहां से राजद के सवर्ण उम्मीदवार डॉ संजीव ने बीजेपी के ओबीसी उम्मीदवार नवल किशोर यादव को हरा दिया. यह एक बड़ा संदेश है क्योंकि राजद को MY यानी मुस्लिम-यादव समीकरण की पार्टी माना जाता है. लेकिन, राजद के सवर्ण उम्मीदवार की जीत दिखाती है कि सवर्ण वोटर अब खुलकर वोट कर रहा है।

हर पार्टी पर लगा है जाति का ठप्पा, सवर्ण बने निर्णायक

जाहिर है, जातियों में बंटी बिहार की राजनीति में हर पार्टी के पीछे कोई ना कोई खास जाति का ठप्पा लगा है. राजद पर यादव-मुस्लिम, जदयू पर कुर्मी-कोइरी, भाजपा पर सवर्ण-बनिया का ठप्पा लगता रहा है. ऐसे में सवर्ण वोटर इस परिणाम से अपनी अहमियत बढ़ा सकते हैं. खास बात यह कि एमएलसी चुनाव में शिक्षक और स्नातक वोटर वैसे भी प्रबुद्ध माने जाते हैं. उनकी पसंद यह बताती है कि आने वाले विधानसभा चुनाव में जो पार्टी सवर्णों को टिकट और सम्मान देगी, सवर्ण वोटर उसके साथ खड़े होंगे, और संभवत: यह आने वाली राजनीति के लिए नया संकेत है।