न कोई मूर्ति, न पुरोहित: पुरुलिया के इस 500 साल पुराने मंदिर में मां काली के साथ पूजे जाते हैं सत्य पीर बाबा...
पुरुलिया, न्यूज। धर्म और आस्था की राहें भले अलग हों, लेकिन विश्वास और श्रद्धा इंसान को एक सूत्र में बांध सकते हैं। इसका अनूठा उदाहरण पुरुलिया जिले के हिड़बहाल गांव में देखने को मिलता है।
यहां एक ही मंदिर में मां भद्रकाली के साथ सत्य पीर बाबा की भी आराधना होती है। करीब पांच सौ वर्षों से चली आ रही यह परंपरा आज भी हिंदू-मुस्लिम एकता और सांप्रदायिक सौहार्द का संदेश दे रही है।
मंदिर की खासियत यह है कि यहां न तो कोई पारंपरिक मूर्ति है और न ही ब्राह्मण पुरोहित पूजा कराते हैं। पीढ़ियों से बाउरी समुदाय के लोग ही पूजा-अर्चना की जिम्मेदारी निभाते आ रहे हैं।
मंदिर के वर्तमान पुजारी तपन बाउरी बताते हैं कि वह पूजा करने वाली वंश परंपरा की नौवीं पीढ़ी से हैं। उनके पिता भी लंबे समय तक पूजा करते रहे हैं। अब वह स्वयं इस परंपरा का निर्वहन कर रहे हैं।
साधक को दर्शन देकर मां ने दिया था पूजा का निर्देश
स्थानीय लोककथाओं के अनुसार, कभी हिड़बहाल का पूरा इलाका घने जंगलों से घिरा था। इसी जंगल में एक साधक मां काली की साधना में लीन रहते थे।
मान्यता है कि साधना से प्रसन्न होकर मां भद्रकाली ने उन्हें दर्शन दिया और पूजा करने का निर्देश दिया। कहा जाता है कि एक सुरंग के रास्ते देवी प्रकट हुई थीं। तभी से यहां मां भद्रकाली की आराधना शुरू हुई। आज भी मंदिर में कोई पारंपरिक प्रतिमा नहीं है। एक वेदी पर ही देवी की पूजा की जाती है।
साधक के सात दिनों तक जल में रहने की भी है मान्यता
मंदिर से जुड़ी एक अन्य लोककथा के अनुसार, देवी ने साधक को अखान यात्रा से सात दिन पहले पास के एक तालाब से अपना पवित्र जल लाने का निर्देश दिया था।
मान्यता है कि साधक तालाब में उतरे और लगातार सात दिनों तक पानी के भीतर रहे। इसके बाद अखान यात्रा के दिन देवी का पवित्र जल और दिव्य अस्त्र लेकर बाहर आए। इसी घटना की स्मृति में आज भी अखान यात्रा के अवसर पर भी विशेष उत्सव आयोजित किया जाता है।
घोड़े पर सवार होकर आए थे सत्य पीर बाबा
इस मंदिर की सबसे खास पहचान मां भद्रकाली के साथ सत्य पीर बाबा की आराधना है। लोककथा के अनुसार, एक दिन साधना के दौरान साधक को नूपुरों की आवाज सुनाई दी।
आवाज का पीछा करते हुए वह आगे बढ़े तो सफेद राजसी वस्त्रों में घोड़े पर सवार एक व्यक्ति दिखाई दिया। परिचय पूछने पर उन्होंने स्वयं को पीर बाबा बताया।
हिंदू समुदाय के लोग उन्हें सत्यनारायण के स्वरूप में श्रद्धा अर्पित करते हैं। इसके बाद से ही एक ही मंदिर में मां भद्रकाली और सत्य पीर बाबा की पूजा की परंपरा शुरू होने की मान्यता है।
कई राज्यों से पहुंचते हैं श्रद्धालु
इस प्राचीन मंदिर की ख्याति अब पुरुलिया तक सीमित नहीं है। पश्चिम बंगाल के विभिन्न जिलों के अलावा झारखंड, बिहार और ओडिशा से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं।
कार्तिक अमावस्या को कालीपूजा के अवसर पर यहां दिन में ही पूजा-अर्चना होती है। अगले दिन मां भद्रकाली के लिए बकरे की बलि और सत्य पीर बाबा के लिए मुर्गे की बलि देने की परंपरा है।
वर्ष का सबसे बड़ा आयोजन पौष पर्व के बाद होने वाली अखान यात्रा है। इस अवसर पर गांव में विशाल मेले का आयोजन होता है।
दूर-दराज से पहुंचे श्रद्धालुओं और ग्रामीणों की भीड़ से पूरा इलाका उत्सवमय हो उठता है। मेले में तरह-तरह के व्यंजनों के साथ मांस-पुलाव सहित कई पकवानों की दुकानें सजती हैं।
ग्रामीण दीनबंधु बाउरी बताते हैं कि यहां दूर-दूर से लोग मन्नत मांगने और पूजा करने आते हैं। लोगों की मान्यता है कि मां के दरबार में सच्चे मन से मांगी गई मुराद पूरी होती है।
करीब पांच शताब्दियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी सामाजिक एकता की मिसाल बनी हुई है। मां भद्रकाली और सत्य पीर बाबा की एक साथ आराधना यह संदेश देती है कि धर्म और संप्रदाय से ऊपर उठकर आस्था, विश्वास और आपसी भाईचारे के सहारे समाज को एकजुट रखा जा सकता है।