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आज कुरुक्षेत्र में हरियाणा राज्य गठन के 60 वर्ष  होने पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने चखा हरियाणा का देसी स्वाद, थाली में सजे खास पकवान...

आज कुरुक्षेत्र में हरियाणा राज्य गठन के 60 वर्ष होने पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने चखा हरियाणा का देसी स्वाद, थाली में सजे खास पकवान...

हरियाणा, कुरूक्षेत्र न्यूज। भारतीय संस्कृति में अतिथि को देवता के समान मानने की परंपरा सदियों पुरानी है। हरियाणा में यह परंपरा विशेष रूप से खानपान और आत्मीय स्वागत के माध्यम से दिखाई देती है। घर आए मेहमान को देसी घी, बूरा और चूरमा परोसना यहां के ग्रामीण जीवन और आतिथ्य संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। 

इसी परंपरा की झलक राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु के गुरुकुल आगमन के अवसर पर भी देखने को मिली। राष्ट्रपति के लिए तैयार किए गए भोजन में हरियाणवी संस्कृति की मिठास, पारंपरिक व्यंजनों का स्वाद और प्राकृतिक खेती से जुड़े खानपान का विशेष संगम देखने को मिला।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु के स्वागत में गुरुकुल में पारंपरिक हरियाणवी भोजन परोसा गया। भोजन की विशेषता केवल उसके स्वाद तक सीमित नहीं थी, बल्कि इसके माध्यम से हरियाणा की ग्रामीण परंपराओं, कृषि संस्कृति और अतिथि सत्कार की भावना को भी प्रस्तुत किया गया। देसी घी, बूरा और चूरमा जैसे पारंपरिक खाद्य पदार्थों ने इस अवसर को सांस्कृतिक दृष्टि से खास बना दिया।

देसी घी, बूरा और चूरमा से हुआ पारंपरिक सत्कार

हरियाणा में जब कोई अतिथि घर पहुंचता है तो उसके स्वागत में पारंपरिक भोजन परोसने की पुरानी परंपरा रही है। विशेष रूप से ग्रामीण परिवारों में देसी घी, बूरा और चूरमा को सम्मान और आत्मीयता के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। इन व्यंजनों का संबंध केवल खानपान से नहीं, बल्कि प्रदेश की जीवनशैली और सामाजिक परंपराओं से भी जुड़ा है।

चूरमा गेहूं की रोटी या आटे से तैयार किया जाने वाला पारंपरिक व्यंजन है। इसमें घी और मिठास के लिए बूरा या गुड़ मिलाया जाता है। यह व्यंजन हरियाणा के अलावा राजस्थान और आसपास के क्षेत्रों में भी लोकप्रिय है। राष्ट्रपति के लिए तैयार भोजन में इन पारंपरिक स्वादों को महत्व दिया गया। इससे हरियाणवी खानपान की उस विशेषता को सामने लाने का प्रयास हुआ, जिसमें सादगी, पौष्टिकता और आत्मीयता का मेल दिखाई देता है।

प्राकृतिक खेती से जुड़े भोजन की रही विशेष पहचान

राष्ट्रपति के लिए तैयार भोजन में प्राकृतिक खेती से जुड़े खाद्य पदार्थों को विशेष महत्व दिए जाने की जानकारी सामने आई है। प्राकृतिक खेती में मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने, स्थानीय संसाधनों का उपयोग करने और रासायनिक आदानों पर निर्भरता कम करने पर जोर दिया जाता है।हरियाणा की कृषि संस्कृति में गेहूं, दूध, दही और घी का महत्वपूर्ण स्थान है। ग्रामीण परिवारों में पारंपरिक रूप से तैयार भोजन स्थानीय कृषि उत्पादन और पशुपालन से जुड़ा रहता है। ऐसे में गुरुकुल में राष्ट्रपति के लिए तैयार देसी भोजन ने प्रदेश की कृषि विरासत को भी सामने रखा।

स्वामी श्रद्धानंद के बलिदान शताब्दी समारोह में शामिल हुईं राष्ट्रपति

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु 1 नवंबर को कुरुक्षेत्र में हरियाणा राज्य के गठन के 60 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में आयोजित हीरक जयंती समारोह में शामिल हुईं। इसके साथ ही उन्होंने गुरुकुल कुरुक्षेत्र में स्वामी श्रद्धानंद के बलिदान शताब्दी समारोह के उपलक्ष्य में आयोजित वार्षिक उत्सव में भी भाग लिया। राष्ट्रपति सचिवालय ने इस दौरे की आधिकारिक पुष्टि की है। गुरुकुल की परंपरा भारतीय शिक्षा, अनुशासन, आत्मनिर्भरता और वैदिक मूल्यों से जुड़ी रही है। स्वामी श्रद्धानंद ने गुरुकुल शिक्षा पद्धति को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। ऐसे ऐतिहासिक अवसर पर राष्ट्रपति का आगमन गुरुकुल के लिए विशेष महत्व रखता है।

हरियाणा की संस्कृति और कृषि परंपरा की सराहना

हरियाणा की हीरक जयंती समारोह में राष्ट्रपति ने प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत और कृषि क्षेत्र में योगदान का उल्लेख किया। उन्होंने अपने संबोधन में बताया कि हरियाणा की खाद्यान्न उत्पादकता राष्ट्रीय औसत से लगभग 50 प्रतिशत अधिक है। राष्ट्रपति ने देश की खाद्य सुरक्षा में हरियाणा के योगदान को भी रेखांकित किया।हरियाणा की पहचान केवल खेती और खेलों तक सीमित नहीं है। यहां की लोकसंस्कृति, पारंपरिक खानपान, लोकगीत और अतिथि सत्कार की परंपरा भी प्रदेश की विशेष पहचान बनाते हैं। राष्ट्रपति के स्वागत में परोसे गए देसी व्यंजनों ने इसी सांस्कृतिक पक्ष को उजागर किया।

सादगी और आत्मीयता का संदेश

भारतीय परंपरा में अतिथि सत्कार का महत्व केवल भव्य आयोजन या महंगे व्यंजनों से नहीं आंका जाता, बल्कि भोजन परोसने के पीछे की आत्मीयता और सम्मान से भी जुड़ा होता है।हरियाणा में घी, बूरा और चूरमा परोसने की परंपरा इसी भावना को दर्शाती है। इन व्यंजनों के माध्यम से अतिथि को सम्मान देने और परिवार की खुशियों में शामिल करने का संदेश मिलता है।राष्ट्रपति के गुरुकुल आगमन के अवसर पर पारंपरिक भोजन की व्यवस्था ने स्थानीय खानपान की विरासत को राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बनाया। इससे यह संदेश भी सामने आया कि आधुनिक दौर में स्थानीय व्यंजनों और पारंपरिक कृषि उत्पादों का सांस्कृतिक महत्व बरकरार है।

देसी भोजन के जरिए दिखाई हरियाणा की पहचान

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु का कुरुक्षेत्र दौरा हरियाणा की हीरक जयंती और स्वामी श्रद्धानंद बलिदान शताब्दी समारोह के कारण महत्वपूर्ण रहा। वहीं, गुरुकुल में उनके लिए तैयार पारंपरिक भोजन ने इस अवसर को एक अलग सांस्कृतिक पहचान दी।

देसी घी, बूरा, चूरमा और प्राकृतिक खेती से जुड़े भोजन के माध्यम से हरियाणा की सादगी, कृषि परंपरा और अतिथि सत्कार की भावना को प्रस्तुत किया गया। इस आयोजन ने एक बार फिर याद दिलाया कि पारंपरिक खानपान केवल स्वाद का विषय नहीं, बल्कि किसी प्रदेश के इतिहास, जीवनशैली और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा भी है।