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वाराणसी : घाटों पर लग रहें गेरुआ साइनेट पत्थर, काशी के घाटों की अब नई पहचान
वाराणसी: पौराणिक काल से बनारस के घाटों का अपना ही महत्व रहा है. बनारस की पहचान में सबसे पहले वहां के घाटों का नाम ही लिया जाता है. घाटों की प्राचीनता ही इनकी ऐतिहासिकता की निशानी है. लेकिन आने वाले समय में पर्यटन संवर्धन योजना के अन्तर्गत इन घाटों का रुप बदलने जा रहा है. योजना के अन्तर्गत घाटों की सीढ़ियो पर गेरुआ रंग के साइनेज लगाए जा रहे है जिससे घाटों से जुड़े महापुरूष की उपलब्धियों को लोगों तक पहुंचाया जा सके. योजना के मुताबिक घाट के सीढ़ियो पर दो या तीन स्टेप्स पर ही साइनेज लगाए जाएंगे.
काशी के कायाकल्प की योजना में घाटों को तेजी से मूर्ति रुप दिया जा रहा है. लेकिन कुछ लोगों के द्वारा इसका विरोध किया था. लोगों का कहना था कि पुराने पत्थरों को काटकर घाटों की ऐतिहासिकता को नुकसान पहुंचाया जा रहा है. परन्तु अधिकारियों ने साफ कर दिया है कि पत्थरों को तोड़ा या हटाया नहीं जा रहा, बल्कि निर्माण कार्य के जरिए घाटों की ऐतिहासिकता को बताने का प्रयास किया जा रहा है.
बनारस के घाटों की ऐतिसाहिक और पौराणिक पहचान है. तुलसीदास घाट को गोस्वामी तुलसीदास के नाम से जाना जाता है, तो राजघाट को संत रविदास से जुड़ा माना जाता है. इसके अलावा भोंसले घाट को स्वामी विवेकानंद का इतिहास आने से जुड़ा है. इसके अलावा हरिशचंद घाट, मणिकार्णिका घाट, चेतसिंह घाट, मानसरोवर और सिंधिया घाट पुराने रजवाड़ों और महापुरुषों से जुड़े हुए है.