ना हाथी, ना घोड़ा, ना रथ. दूल्हे की ऐसी सवारी कि बारात देखकर गांव वालों की आंखें खुली की खुली रह गईं...
शॉदी का मौसम आते ही आमतौर पर चमचमाती गाड़ियां, डीजे की तेज आवाज, लाइटों की चकाचौंध और घोड़ी पर सवार दूल्हा देखने को मिलता है। लेकिन इस बार एक शादी ने सबको चौंका दिया। यहां न तो लग्जरी कारों का काफिला था, न ही दिखावे का शोर। इस शादी में बारात ऐसी निकली, जिसने लोगों को कुछ पल के लिए वक्त में पीछे ले जाकर पुरानी यादों से जोड़ दिया। जैसे ही सजी-धजी बैलगाड़ियों की कतार गांव की गलियों में निकली, लोग अपने घरों से बाहर आ गए। यह नजारा सिर्फ शादी का नहीं था, बल्कि सादगी, परंपरा और समाज को दिए गए एक मजबूत संदेश का प्रतीक बन गया।
बैलगाड़ियों से सजी अनोखी बारात
जब रात के समय बैंड-बाजे के साथ एक के बाद एक सजी हुई बैलगाड़ियां गांव की गलियों में नजर आईं, तो हर कोई हैरान रह गया. बैलों के सींगों पर रंग-बिरंगे कपड़े और फूलों की मालाएं सजी थीं. सबसे खास बात यह थी कि दूल्हा न घोड़े पर था और न ही कार में, बल्कि पूरी शान से बैलगाड़ी में सवार होकर बारात लेकर निकला. यह दृश्य देखने के लिए लोग रास्तों पर जमा हो गए और मोबाइल कैमरों में इसे कैद करने लगे. यह बारात आधुनिक शादियों से बिल्कुल अलग थी, जिसने हर किसी का ध्यान खींच लिया।
दूल्हे के पिता की सोच बनी मिसाल
इस अनोखी पहल के पीछे दूल्हे के पिता राम सहाय यादव की सोच थी. उन्होंने अपने बेटे राम यादव की शादी में यह तरीका अपनाकर समाज को एक साफ संदेश देने की कोशिश की. उनका कहना था कि आजकल शादियां दिखावे और फिजूलखर्ची का जरिया बन गई हैं, जहां लोग हैसियत से ज्यादा खर्च करने को मजबूर हो जाते हैं. उन्होंने परंपराओं को सिर्फ किताबों तक सीमित रखने के बजाय उन्हें व्यवहार में उतारने का फैसला किया. बैलगाड़ी से निकली यह बारात उनके लिए गर्व का विषय थी और समाज के लिए एक उदाहरण भी।
गांव वालों का स्वागत और बुजुर्गों की यादें
जैसे-जैसे बारात आगे बढ़ी, रास्ते में ग्रामीणों ने फूल-मालाओं से स्वागत किया और पुष्प वर्षा की. माहौल पूरी तरह पुराने जमाने की शादियों जैसा हो गया. बुजुर्गों के चेहरों पर खास खुशी थी, क्योंकि उन्हें अपने समय की शादियां याद आ गईं. लोगों का कहना था कि पहले शादियां इसी सादगी से होती थीं, जहां खुशी दिखावे से नहीं बल्कि रिश्तों से झलकती थी. यह बारात केवल दूल्हा-दुल्हन को मिलाने का जरिया नहीं बनी, बल्कि गांव के लोगों को भावनात्मक रूप से भी जोड़ गई।