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बेस्ट बंगाल की सियासत में आया जबरदस्त मोड़, ममता दीदी ने अल्लाह के आशीर्वाद की बात की, शुभेंदु अधिकारी ने काली माँ की पूजा की...

बेस्ट बंगाल की सियासत में आया जबरदस्त मोड़, ममता दीदी ने अल्लाह के आशीर्वाद की बात की, शुभेंदु अधिकारी ने काली माँ की पूजा की...

प.बंगाल से केसरी न्यूज 24। पश्चिम बंगाल की सियासत इस वक्त उबाल पर है और चुनावी मैदान अब सीधे धर्म, पहचान और प्रभाव की जंग में बदल चुका है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और भाजपा नेता शुभेन्दु अधिकारी के बीच छिड़ी यह टक्कर अब केवल वोटों की लड़ाई नहीं रही, बल्कि यह प्रतीकों, भावनाओं और नैरेटिव की निर्णायक भिड़ंत बन गई है। खासतौर पर बंगाल की सियासत में आज का दिन काफी महत्वपूर्ण रहा। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने ईद मनाई तो वहीं उनके मुख्य प्रतिद्वंद्वी शुभेन्दु अधिकारी ने कालीघाट मंदिर जाकर माता के चरणों में माथा टेका। ममता की और शुभेन्दु की आज की तस्वीरें अपने अपने मतदाताओं के लिए बड़ा संदेश है।

देखा जाये तो ईद के मौके पर ममता बनर्जी का नमाज में शामिल होना कोई सामान्य राजनीतिक कार्यक्रम नहीं था। यह एक सोची समझी रणनीति का हिस्सा था, जिसके जरिए उन्होंने सीधे तौर पर भाजपा और केंद्र सरकार पर हमला बोला है। अपने भाषण में उन्होंने मतदाता अधिकारों की रक्षा की बात करते हुए चुनाव आयोग तक पर सवाल खड़े कर दिए। यह बयान साफ संकेत देता है कि ममता अब खुद को केवल नेता नहीं, बल्कि लोकतंत्र की रक्षक के रूप में पेश करना चाहती हैं। 

ममता दीदी ने ईद की मुबारकबाद, अल्लाह का आशीर्वाद जैसे शब्दों का उपयोग कर अल्पसंख्यक मतदाताओं को यह बताना चाहा कि टीएमसी ही उनकी हितैषी है। साथ ही ममता ने धार्मिक मंच से राजनीतिक भाषण देकर प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा को जिस तरह निशाने पर लिया उससे उन्होंने अपने पार्टी काडर को संदेश दिया कि वह पूरी मजबूती से मैदान में डटी हुई हैं।

दूसरी ओर, शुभेन्दु अधिकारी ने कालीघाट मंदिर में पूजा अर्चना कर पूरी सियासत को एक अलग ही दिशा दे दी। उन्होंने खुलकर सनातन की जीत का नारा दिया और बंगाल में सत्ता परिवर्तन का दावा किया। मां काली से आशीर्वाद लेने की यह तस्वीर केवल धार्मिक आस्था का प्रदर्शन नहीं, बल्कि एक मजबूत राजनीतिक संदेश थी कि भाजपा अब बंगाल की सांस्कृतिक पहचान को केंद्र में रखकर चुनाव लड़ेगी।

इन दोनों घटनाओं का समय और अंदाज बेहद महत्वपूर्ण है। एक तरफ अल्पसंख्यक समुदाय को साधने की कोशिश, तो दूसरी तरफ बहुसंख्यक पहचान को मजबूत करने का प्रयास। यही वह मोड़ है जहां बंगाल की सियासत खतरनाक रूप से ध्रुवीकरण की ओर बढ़ती दिख रही है। अब साफ हो चुका है कि पश्चिम बंगाल का चुनाव केवल विकास, योजनाओं या वादों तक सीमित नहीं रहेगा। यह चुनाव अब पहचान की लड़ाई है, जहां हर तस्वीर, हर मंच और हर बयान एक बड़े राजनीतिक संदेश में बदल रहा है।

बंगाल की जनता के सामने अब सीधा सवाल है कि क्या वे इस धार्मिक और प्रतीकात्मक राजनीति के साथ जाएंगे या किसी अलग रास्ते की तलाश करेंगे। लेकिन इतना तय है कि आने वाले दिनों में बयानबाजी और तेज होगी, टकराव और गहरा होगा और बंगाल की राजनीति पहले से कहीं ज्यादा आक्रामक रूप लेगी। देखा जाये तो यह चुनाव अब सिर्फ सत्ता की लड़ाई नहीं, बल्कि विचारों, भावनाओं और प्रभाव की सबसे बड़ी परीक्षा बन चुका है।