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काश !! ईरान के पास भी होता इस्लामी परमाणु बम' पाकिस्तानी वैज्ञानिक ए क्यू खान ने तेहरान भेजी थी तकनीक, एक चूक ने खत्म किया 'खेल'

काश !! ईरान के पास भी होता इस्लामी परमाणु बम' पाकिस्तानी वैज्ञानिक ए क्यू खान ने तेहरान भेजी थी तकनीक, एक चूक ने खत्म किया 'खेल'

इस्लामाबाद: अमेरिका-इजरायल गठबंधन और ईरान के बीच दुनिया ने हालिया दिनों में एक भीषण युद्ध देखा है। इस युद्ध के कारणों में एक अहम वजह ईरान के परमाणु कार्यक्रम को माना जाता है। ईरान ने बार-बार ये कहा है कि वह परमाणु बम नहीं बनाना चाहते हैं लेकिन एक समय पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम के जनक अब्दुल कदीर खान (ए क्यू खान) ने तेहरान को न्यूक्लियर हथियार बनाने की तकनीक देने की कोशिश की थी।हालांकि चीजें उनके हिसाब से नहीं चलीं और तेहरान परमाणु नहीं बना सका।

मिडिल ईस्ट आई की रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2021 में दुनिया छोड़ चुके ए. क्यू. खान ने एक समय में अपने अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क के बारे में बात करते हुए ईरान, लीबिया और उत्तरी कोरिया को परमाणु तकनीक देने की इच्छा जाहिर की थी। पाकिस्तान के एक विवादित शख्स रहे खान का कहना था कि आखिर अमेरिकियों और ब्रिटिश लोगों के पास ही परमाणु क्यों होना चाहिए।

ए क्यू खान पर इजरायल की नजर

इजरायल ने 1980 के दशक में मुस्लिम-बहुल देश पाकिस्तान को परमाणु बम हासिल करने से रोकने की कोशिश की थी। इजरायल के निशाने पर पाकिस्तान के सफल परमाणु कार्यक्रम में सबसे अहम भूमिका निभाने वाले व्यक्ति ए क्यू खान थे। खान का मकसद सिर्फ अपने देश को एक परमाणु शक्ति बनाना ही नहीं था बल्कि दूसरे मुस्लिम देशों को भी परमाणु ताकत बनाना था।

इजरायली जासूसों की कड़ी निगरानी के बावजूद खान का मकसद इराक, लीबिया, चुर्की ईरान जैसे देशों को उनके अपने परमाणु कार्यक्रम में मदद करके अमेरिका और पश्चिमी देशों को चुनौती देना था। CIA के पूर्व निदेशक जॉर्ज टेनेट ने कहा था कि खान भी ओसामा बिन लादेन जितने खतरनाक थे। मोसाद के पूर्व प्रमुख शबताई शावित ने खान को जान से नहीं मारने पर अफसोस तक जताया था।

उत्तर कोरिया ही बना पाया परमाणु बम

ए क्यू खान ने जिन देशों को परमाणु तकनीक देकर मदद की, उनमें से सिर्फ उत्तरी कोरिया ही एक परमाणु शक्ति बन पाया। 2000 के दशक की शुरुआत में ईरान के परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह से खत्म कर दिया गया था। हालांकि पाकिस्तानी वैज्ञानिक खान ने ईरान को परमाणु हथियार बनाने के काफी करीब पहुंचा दिया था।

पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम की बात की जाए तो 70 के दशक में प्रधानमंत्री रहे जुल्फिकार अली भुट्टो ने भारत में परीक्षण के बाद न्यूक्लियर हथियार बनाने की कसम खाई थी। उन्होंने कहा था कि दुनिया में एक 'ईसाई बम' है, एक 'यहूदी बम' है और अब 'हिंदू बम' आ गया है। फिर एक 'इस्लामी बम' क्यों नहीं बनाया जाना चाहिए। इसमें पाकिस्तान के लिए सबसे अहम शख्स ने ए क्यू खान।

 
खान पर चोरी के आरोप

ए क्यू खान 1974 में एम्स्टर्डम में एक बड़ी न्यूक्लियर फ्यूल कंपनी यूरेनको के एक सब-कॉन्ट्रैक्टर के लिए काम कर रहे थे। यह कंपनी यूरोप के न्यूक्लियर रिएक्टरों के लिए एनरिच्ड यूरेनियम फ्यूल सप्लाई करती थी। खान की पहुच यूरेनको फैसिलिटी के सबसे सीक्रेट हिस्सों तक थी और दुनिया के सबसे बेहतरीन सेंट्रीफ्यूज के ब्लूप्रिंट थे। ये सेंट्रीफ्यूज नैचुरल यूरेनियम को एनरिच करके बम के फ्यू में बदलते थे।

खान पर आरोप लगा कि उन्होंने नीदरलैंड्स से यूरेनियम सेंट्रीफ्यूज का ब्लूप्रिंट चुराया, जिससे यूरेनियम को हथियार-ग्रेड ईंधन में बदला जा सकता है। खान ने पाकिस्तान लौटकर जुलाई 1976 में खान ने रावलपिंडी में रिसर्च लैब बनाई और परमाणु हथियारों के लिए एनरिच्ड यूरेनियम तैयार किया। पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम में उसे चीन से मदद मिली और अमेरिका ने भी कई बार आंख फेरकर उसके कार्यक्रम को नजरअंदाज किया।

पाकिस्तान का परमाणु बम

11 मई 1998 को, भारत ने अपने परमाणु हथियारों का परीक्षण किया। उसी महीने के आखिर में पाकिस्तान ने भी बलूचिस्तान के रेगिस्तान में अपने परमाणु हथियारों का सफल परीक्षण किया। इसके साथ ही वह दुनिया की सातवीं परमाणु शक्ति बन गया। इसके बाद खान ने कहा था मैंने जुल्फिकार भुट्टो से कहा था कि हम परमाणु बम जरूर हासिल करेंगे। मैंने वादा किया था और वादा निभाया।

अब बात ईरान के परमाणु कार्यक्रम की करते हैं। दरअसल ए क्यू खान सिर्फ पाकिस्तान ही नहीं बल्कि कई न्यूक्लियर प्रोग्रान चला रहे थे। उनका एक अंतरराष्ट्रीय परमाणु नेटवर्क था। इसमें ईरान, उत्तरी कोरिया और लीबिया को परमाणु तकनीक और डिजाइन भेजे जाते थे। 1980 के दशक में सीक्रेट तरीके के ईरान और पाकिस्तान में परमाणु कार्यक्रम पर बात हुई थी।

पाकिस्तान की ईरान को मदद

साल 1989 से 1997 तक ईरान के राष्ट्रपति रहे अकबर हाशेमी रफसंजानी ने 2015 में एक इंटरव्यू में कहा था, 'हम अपने पास एक ऐसा विकल्प (परमाणु) रखना चाहते थे, ताकि हमारे दुश्मन परमाणु हथियारों का इस्तेमाल करना चाहें तो हम भी उसका जवाब दे सकें। अब्दुल कदीर खान का भी मानना था कि इस्लामी दुनिया के पास परमाणु बम होना चाहिए।

अकबर हाशेमी रफसंजानी के मुताबिक, इस बात पर सहमति बनी कि पाकिस्तान हमारी थोड़ी मदद करें। हमें पुराने और पहली पीढ़ी के सेंट्रीफ्यूज देने के साथ-साथ कुछ डिजाइन भी दे ताकि हम खुद ही इसे बना सकें। धीरे-धीरे हमने इस काम की शुरुआत कर दी। पाकिस्तानियों ने हमें 4,000 पुराने और पहली पीढ़ी के सेंट्रीफ्यूज दिए और साथ में उनके डिजाइन भी दिए।

खत्म हुआ ईरान का परमाणु कार्यक्रम

साल 1986 से 2001 के बीच पाकिस्तान ने ईरान को वे जरूरी पुर्जे दिए, जिनकी उसे जरूरत थी। खान ने खुद फरवरी 1986 और जनवरी 1987 में बुशेहर में ईरानी रिएक्टर का दौरा किया था। माना जाता है कि 1989 और 1995 के बीच खान ने ईरान को सेंट्रीफ्यूज के लिए 2,000 से ज्यादा कंपोनेंट और सब-असेंबली भेजी थीं।

साल 2003 में ईरान का यह पूरा ऑपरेशन पूरी तरह से खत्म हो गया। लीबियाई नेता मुअम्मर गद्दाफी ने अमेरिका का समर्थन पाने की कोशिश में खान के ऑपरेशन का भंडाफोड़ कर दिया। साल 2004 में खान ने खुद परमाणु प्रसार नेटवर्क चलाने की बात कबूल करते हुए कहा कि उन्होंने ईरान, लीबिया और उत्तरी कोरिया को परमाणु तकनीक दी थी। खान ने कहा कि ईरान को परमाणु हथियार बनाने का पूरा हक है।