आशा भोसले और लता मंगेशकर ने एक ही उम्र में दुनिया को कहा अलविदा, आखिरी दिन दोनों बहनों के एक जैसे थे ये संयोग...
‘स्वर कोकिला’ लता मंगेशकर के निधन के चार साल बाद 12 अप्रैल, 2026 को उनकी छोटी बहन आशा भोसले ने भी दुनिया को अलविदा कह दिया। ‘आशा ताई’ को शनिवार 11 अप्रैल को तबीयत खराब होने के बाद मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में भर्ती कराया गया था। अगले दिन रविवार को उनके बेटे आनंद ने बताया कि मां का निधन हो गया है।
बता दें कि आशा भोसले और लता मंगेशकर दोनों ने ही अपनी आवाज से लोगों और फिल्म इंडस्ट्री पर राज किया, लेकिन क्या आप जानते हैं कि इन दोनों बहनों ने एक ही उम्र में दुनिया को अलविदा कहा। इसके अलावा भी दोनों बहनों के निधन से जुड़े कई और कनेक्शन हैं, चलिए आपको उनके बारे में बताते हैं।
लता मंगेशकर और आशा भोसले से जुड़े कनेक्शन
यह संयोग ही है कि संगीत के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाने वाली दोनों बहनों ने 92 वर्ष की आयु में ही दुनिया को अलविदा कह दिया। इसके अलावा दोनों के निधन का दिन ही रविवार रहा और दोनों ने मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में ही अपनी अंतिम सांसें लीं। बता दें कि लता मंगेशकर का निधन 6 फरवरी, 2022 को हुआ था।
एक ही बीमारी से हुआ निधन
स्वर कोकिला को पहले कोविड हुआ था। बाद में मल्टी ऑर्गन फेलियर के बाद गायिका का निधन हो गया था। उसी तरह आशा भोसले को चेस्ट इन्फेक्शन हुआ और फिर मल्टी ऑर्गन फेलियर के चलते उनका निधन हो गया।
अभिनय में भी आजमाया हाथ
आशा भोसले ने दो फिल्मों में काम किया, जिसमें एक हिंदी फिल्म 'बड़ी मामी' और एक मराठी फिल्म हैं। लेकिन अभिनय में उनकी ज्यादा रुचि नहीं थी। उन्हें लगा कि अभिनय से अच्छा गाना है।
ओपी नय्यर व एसडी बर्मन का साथ
गीतकार ओपी नय्यर का मानना था कि वे लता के बिना भी सुपरहिट संगीत दे सकते हैं। नैयर की शुरुआती पसंद गीता दत्त थीं, लेकिन फिल्म सीआइडी के बाद उनके संगीत में आशा भोसले ने जगह बना ली। उन्होंने आशा की आवाज के निचले सुरों की गहराई को पहचाना और 'नया दौर' (1957) के जरिए एक इतिहास रच दिया। उसी साल (1957), संगीतकार एसडी बर्मन और लता मंगेशकर के बीच हुए मनमुटाव ने आशा के लिए सफलता के नए दरवाजे खोल दिए। अगले पांच सालों तक जब एसडी बर्मन ने लता के साथ काम नहीं किया, तब आशा उनके कैंप की मुख्य गायिका बनकर उभरीं।
इन पांच सालों में आशा ने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा लिया। एसडी बर्मन, किशोर कुमार, आशा भोसले और गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी की चौकड़ी ने रूमानी और चुलबुले गीतों का एक नया दौर शुरू किया। 'हाल कैसा है जनाब का', 'आंखों में क्या जी', 'छोड़ दो आंचल' और 'दीवाना मस्ताना हुआ दिल' जैसे यादगार नगमे आज तक लोग याद करते हैं। ओपी नय्यर और एसडी बर्मन का दौर आशा के लिए सिर्फ काम का नहीं, बल्कि अपनी पहचान तराशने का सुनहरा समय था। आशा को अलग अंदाज वाली गायिका के रूप में स्थापित करने का श्रेय ओपी नय्यर को ही जाता है।
पंचम और आशा की जोड़ी
एसडी बर्मन के साथ काम करते हुए ही आशा की मुलाकात उनके बेटे आरडी बर्मन (पंचम) से हुई। उम्र में छोटे पंचम अपने पिता की विरासत के बीच अपनी खुद की जÞमीन तलाश रहे थे। किसी को अंदाजा नहीं था कि आने वाले सालों में यह जोड़ी सुरों का एक नया इतिहास रचने वाली है। 1966 में नासिर हुसैन की फिल्म 'तीसरी मंजिल' के साथ उनका पहला पेशेवर सहयोग शुरू हुआ। यहीं से उस रचनात्मक और रूमानी साझेदारी की नींव पड़ी, जिसने हिंदी फिल्मी संगीत की तासीर ही बदल दी।
आरडी बर्मन हिंदी सिनेमा में 'फंक, जैज, कैबरे और राक-एन-रोल' आजमाना चाहते थे, लेकिन इन जटिल धुनों को निभाने के लिए उन्हें एक ऐसी आवाज चाहिए थी, जो लचकदार हो और जिसमें जोखिम लेने का साहस हो। आशा भोसले वह आवाज बनीं। पंचम ने अपने संगीत में पाश्चात्य मिजाज को पिरोया, तो आशा की आवाज ने उस संगीत में एक बेबाक कशिश और आजाद खयाली के नए रंग भर दिए।