आदि शंकराचार्य जयंती !!! जानें शिवावतार श्री शंकर के जन्म, गुरु परंपरा और पीठ स्थापना का पूरा इतिहास...
स्वामी निश्चलानंद सरस्वती (जगद्गुरु शंकराचार्य, पूर्वाम्नाय गोवर्धन पीठ, पुरी)। द्धादि के शासनकाल में अहिंसा, सत्य, आस्तेय, ब्रह्मचर्य व अपरिग्रह नामक पंचशील को सनातन रीति से जीवन में पूर्ण रूप से उतारने की परंपरा लुप्तप्राय हो गई थी। सनातन परंपरा के शैव, वैष्णव, सौर, शाक्त, गाणपत्य उपासना के नाम पर अग्निहोत्रादि वैदिक कर्मों का परित्याग कर चुके थे। संकीर्ण मनोभाव, परस्पर विवाद, राजसत्ता के दबाव के कारण वैदिक सनातनी दैदीप्यमान होते हुए भी हतप्रभ सिद्ध हो रहे थे। ऐसे विषम समय में साक्षात सदाशिव व्यास पीठ, शासन तंत्र तथा लोकतंत्र के शोध की भावना से भगवत्पाद श्रीआदि शंकराचार्य के रूप में अवतीर्ण हुए।
शंकरदिग्विजय ग्रंथ के अनुसार, जब सनकादिक महर्षियों का प्राथमिक सर्ग समाप्त हो गया और वैदिक सन्मार्ग की दुर्गति होने लगी, तब इस भूतल पर भगवान शिव, शंकर रूप में अवतरित हुए। आदि शंकराचार्य का आविर्भाव आज से 2533 वर्ष पूर्व यानी 507 ईसा पूर्व, युधिष्ठिर संवत 2631 में वैशाख शुक्ल पंचमी, रविवार को केरल के कालड़ी में हुआ था। उनके माता-पिता आर्यांबा और श्रीशिवगुरु को समय पर संतान प्राप्त नहीं हुई तो इसके लिए उन्होंने शिव-शक्ति की आराधना की। भगवान शिव ने उन्हें सर्वज्ञ, यशस्वी, अल्पायु पुत्र के रूप में स्वयं अवतीर्ण होने का वर दिया।
भगवान शिव के अनुग्रह से प्राप्त शिशु का नाम शंकर रखा गया, जो बाद में शिवावतार आदि शंकराचार्य के नाम से विख्यात हुए। पांच वर्ष की अवस्था में उनका उपनयन संस्कार हुआ, उसी वर्ष उनके पिता का देहांत हो गया। कुल नौ वर्ष की आयु में उन्होंने सर्वभूतहृदय श्रीशुकदेवजी के शिष्य श्रीगौड़पादाचार्य के शिष्य श्रीगोविंद पादाचार्य से संन्यास दीक्षा का विधिवत उपदेश प्राप्त किया। यद्यपि आठ वर्ष की वय में ही कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी, संवत 2639 को वह संन्यास पथ पर प्रयाण कर चुके थे।
पूज्यपाद आदि शंकराचार्य को गुरु के सान्निध्य में रहकर गुरु की सेवा करना अभीष्ट था, किंतु गुरुवर ने उन्हें काशी जाकर भगवान शिव का अनुग्रह प्राप्त कर ब्रह्मसूत्र एवं अन्य ग्रंथों की भाष्यादि की संरचना कर आगे का कार्य संपन्न करने का आदेश दिया। काशी में एक दिन चोल देश दक्षिण निवासी एक ब्राह्मण कुमार उनके समीप आया और उसने उनका शिष्य बनने की दृढ़ इच्छा प्रकट की। पूज्यपाद ने कृपापूर्वक उस बालक की प्रार्थना स्वीकार करते हुए उसे शिष्य रूप में अपनाकर समय पर संन्यास दीक्षा दी और उसका नाम सनंदन रखा यही सनंदन कालांतर में श्रीपद्मपाद नाम से चर्चित हुए।भगवत्पाद ने श्रीविष्णु सहस्त्रनाम, ब्रह्मसूत्र आदि अनेक ग्रंथों पर भाष्य लिखकर प्रपंचसार, सौंदर्य लहरी जैसे तंत्र ग्रंथों एवं अपरोक्षानुभूति, विवेक चूड़ामणि आदि प्रकरण ग्रंथों एवं विविध स्तोत्र ग्रंथों की संरचना कर वैदिक वांग्मय को समृद्ध किया।
पूज्यपाद शंकराचार्य महाभाग ने भारत को भौगोलिक, सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक दृष्टि से सुरक्षित एवं सुव्यवस्थित करने के उद्देश्य से देश की चारों दिशाओं में एक-एक आम्नाय पीठ की स्थापना की। पूर्व में ऋग्वेद से संबद्ध श्रीगोवर्धन पीठ की, पश्चिम में सामवेद से संबद्ध द्वारका शारदा पीठ की, उत्तर में अथर्ववेद से संबद्ध ज्योतिष्पीठ की तथा दक्षिण में यजुर्वेद से संबद्ध शृंगेरी पीठ की। मूर्तिभंजकों के उत्पात के कारण पुरी के जगन्नाथ मंदिर से भगवान जगन्नाथ, बलभद्र, सुभद्रा देवी तथा सुदर्शन महाराज अंतर्धान हो गए थे। पूज्यपाद ने अपने साधना बल से उन्हें प्रकट कर उनकी पुनर्स्थापना की।
इसी प्रकार बद्री नारायण में भगवान बद्रीनाथ के लुप्त विग्रह और नेपाल में भगवान पशुपतिनाथ के विग्रह की भी उन्होंने पुनर्स्थापना की। उन्होंने चारों मठों में एक-एक शंकराचार्य को प्रतिष्ठित किया तथा यह घोषणा की कि चारों पीठों के शंकराचार्य का स्थान वही होगा, जो स्वयं उनका है अर्थात वे चारों शिवावतार ही मान्य होंगे।