'बंगाल में बाइक चलाने और पीछे बैठने पर लगा बैन, तत्काल रिसॉर्ट-तट और होटल खाली कर दो... ', बंगाल चुनाव में आयोग का 'न भूतो न भविष्यति' जैसा आदेश?...
ECI vacate coastal resorts of digha mandarmani: पश्चिम बंगाल की राजनीति हमेशा से ही गरम रही है, लेकिन इस बार चुनाव आयोग के एक आदेश ने उस गर्मी को बेचैनी में बदल दिया है। अक्सर चुनाव के दौरान सीमाओं को सील करने या शराब की दुकानें बंद करने की खबरें तो आती हैं, लेकिन क्या आपने कभी सुना है कि चुनाव की वजह से किसी चलते-फिरते टूरिस्ट हब को ही खाली करा दिया जाए?जी हां, बंगाल के पूर्वी मेदिनीपुर में यही हो रहा है। चुनाव आयोग ने दीघा और मंदारमणि जैसे बीचों पर छुट्टी मना रहे सैलानियों को अपना बोरिया-बिस्तर समेटने का अल्टीमेटम दे दिया है।
मीडिया में छपी खबर के मुताबिक, पुलिस की गाड़ियां लाउडस्पीकर पर घोषणा कर रही हैं कि जो लोग यहां के वोटर नहीं हैं, वे तुरंत जिला छोड़ दें। आयोग का यह रुख 'न भूतो न भविष्यति' जैसा है, क्योंकि इससे पहले कभी पर्यटन उद्योग पर चुनावी सुरक्षा का ऐसा 'हंटर' नहीं चला था। इस आदेश ने न केवल पर्यटकों की मौज-मस्ती पर ब्रेक लगाया है, बल्कि स्थानीय कारोबार और रोज कमाने-खाने वाले बाइक सवारों की कमर भी तोड़ दी है।
पर्यटकों के लिए नो-एंट्री और 'होटल खाली' का अल्टीमेटम
बंगाल के दीघा और मंदारमणि जैसे इलाके सैलानियों की पहली पसंद माने जाते हैं. यहां सालों भर भीड़ रहती है, लेकिन चुनाव आयोग को डर है कि इसी भीड़ का फायदा उठाकर 'बाहरी उपद्रवी' जिले में दाखिल हो सकते हैं. इस मीडिया में छपी खबर के मुताबिक, आयोग ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि मंगलवार शाम 6 बजे के बाद इन इलाकों के होटलों में कोई भी गैर-निवासी व्यक्ति नहीं दिखना चाहिए।
होटलों को अपनी बुकिंग रद्द करने और वर्तमान मेहमानों को विदा करने का जिम्मा सौंपा गया है. आयोग का तर्क है कि मतदान के दौरान 'सोर्स जैमिंग' और मतदाताओं को डराने-धमकाने के लिए बाहरी तत्व होटलों को अपना सुरक्षित ठिकाना बना लेते हैं. इसी वजह से पूर्वी मेदिनीपुर के तटीय बेल्ट में एक तरह से 'टूरिस्ट लॉकडाउन' लगा दिया गया है, जो 23 अप्रैल को मतदान की प्रक्रिया पूरी होने तक प्रभावी रहेगा।
बाइक पर लगा ब्रेक, गिग वर्कर्स के उड़े होश
चुनाव आयोग का दूसरा सबसे बड़ा वार बाइक चलाने वालों पर हुआ है. मतदान से 48 घंटे पहले रात 6 बजे से सुबह 6 बजे तक दोपहिया वाहनों के चलने पर पूरी तरह रोक है. इतना ही नहीं, दिन के समय भी बाइक पर पीछे सवारी बिठाना (पिलियन राइडिंग) मना है। इस मीडिया में छपी खबर के मुताबिक, कोलकाता और आसपास के इलाकों में लगभग 40 हजार ऐसे राइडर्स हैं जो बाइक टैक्सी या डिलीवरी के काम से अपना घर चलाते हैं। इन गिग वर्कर्स का कहना है कि दो दिन काम बंद रहने का मतलब है परिवार के राशन और बच्चों की स्कूल फीस पर संकट. आयोग का कहना है कि बाइक का इस्तेमाल अक्सर चुनावी हिंसा में तेजी से भागने और गुंडागर्दी के लिए किया जाता है, इसलिए इसे रोकना जरूरी है. हालांकि, इस फैसले ने आम जनता की आवाजाही को बेहद मुश्किल बना दिया है।
ममता बनर्जी ने फैसले को बताया 'गरीबों पर हमला'
राजनीतिक गलियारों में चुनाव आयोग के इस फैसले पर तीखी प्रतिक्रिया हुई है. पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने एक चुनावी रैली के दौरान इस पाबंदी पर कड़ी नाराजगी जाहिर की. उन्होंने आयोग के इस कदम को "गरीबों के खिलाफ साजिश" करार दिया. इस मीडिया में छपी खबर के मुताबिक, ममता बनर्जी ने कहा कि बहुत से लोग बाइक से काम पर जाते हैं, कई लोग दूर-दराज के गांवों से शहर आते हैं, ऐसे में बाइक और पीछे बैठने वाली सवारी पर बैन लगाना तानाशाही है. उन्होंने सवाल उठाया कि अगर कोई बीमार है या किसी को जरूरी काम से जाना है, तो वह बाइक के बिना कैसे जाएगा? मुख्यमंत्री का कहना है कि यह सुरक्षा के नाम पर आम आदमी को परेशान करने का तरीका है।
लाउडस्पीकर से मुनादी और पुलिस की सख्त चेकिंग
सोमवार रात से ही बंगाल की सड़कों पर पुलिस का एक्शन मोड नजर आ रहा है. दीघा और मंदारमणि की तटरेखा पर पुलिस की गाड़ियां लगातार पेट्रोलिंग कर रही हैं. इस मीडिया में छपी खबर के मुताबिक, पर्यटकों को यह समझाया जा रहा है कि यह आदेश उनकी सुरक्षा और निष्पक्ष चुनाव के लिए है. अगर कोई भी व्यक्ति आदेश का उल्लंघन करते हुए पाया गया, तो उसके खिलाफ 'भारतीय न्याय संहिता' की धारा 223 के तहत कार्रवाई की जाएगी. आपको बता दें कि इस धारा के तहत सरकारी आदेश की अवहेलना करने पर 6 से 12 महीने तक की जेल हो सकती है. पुलिस ने साफ कर दिया है कि वे किसी भी होटल या लॉज की आकस्मिक जांच कर सकते हैं और अगर कोई बाहरी व्यक्ति मिला, तो होटल मालिक पर भी गाज गिरेगी।
इमरजेंसी में छूट के लिए थाने के काटने होंगे चक्कर
आयोग ने हालांकि कुछ मामलों में ढील देने की बात कही है, लेकिन उसके नियम काफी पेचीदा हैं. अगर किसी को अस्पताल जाना है, परिवार में कोई शादी है या बच्चों को स्कूल से लाना-ले जाना है, तो उन्हें स्थानीय थाने से लिखित अनुमति लेनी होगी. इस मीडिया में छपी खबर के मुताबिक, आम लोगों के लिए यह प्रक्रिया किसी सिरदर्द से कम नहीं है. एक तरफ चुनावी तनाव और दूसरी तरफ कागजी कार्यवाही के लिए थानों के चक्कर लगाना, जनता के लिए मुसीबत का सबब बन गया है. पुलिस अधिकारियों का कहना है कि उनके पास भी स्पष्ट गाइडलाइंस की कमी है कि आखिर 'इमरजेंसी' की परिभाषा क्या होगी, जिससे जमीनी स्तर पर काफी कन्फ्यूजन पैदा हो रहा है।
रामनगर विधानसभा सीट पर टिकी सबकी नजरें
जिन इलाकों में यह पाबंदी लगाई गई है, वे मुख्य रूप से रामनगर विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत आते हैं. यह सीट राजनीतिक रूप से काफी हाई-प्रोफाइल मानी जाती है. इस मीडिया में छपी खबर के मुताबिक, तृणमूल कांग्रेस के विधायक अखिल गिरि का यहां लंबे समय से प्रभाव रहा है. ऐसे में चुनाव आयोग यहाँ किसी भी तरह की ढील देकर विपक्षी दलों को शिकायत का मौका नहीं देना चाहता. आयोग की कोशिश है कि मतदान के दिन केवल स्थानीय मतदाता ही सड़कों पर दिखें. लेकिन इस 'क्लीनअप ड्राइव' ने स्थानीय व्यापारियों, विशेषकर मछली कारोबारियों और छोटे दुकानदारों को भी आर्थिक रूप से काफी चोट पहुंचाई है, क्योंकि सैलानियों के बिना उनका धंधा ठप पड़ गया है।
आखिर कब मिलेगी इस चुनावी पाबंदी से मुक्ति?
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि यह 'जेल जैसी' स्थिति कब तक रहेगी? इस मीडिया में छपी खबर के मुताबिक, पर्यटकों और बाहरी लोगों के लिए यह पाबंदी 23 अप्रैल की शाम, यानी पहले चरण के मतदान के संपन्न होने तक लागू रहेगी. इसके बाद स्थिति धीरे-धीरे सामान्य होगी. लेकिन बाइक और अन्य वाहनों पर लगी पाबंदियां अगले चरणों के दौरान अन्य जिलों में भी लागू की जा सकती हैं. बंगाल की जनता और सैलानी अब बस इसी इंतजार में हैं कि कब लोकतंत्र का यह उत्सव शांति से संपन्न हो और वे दोबारा अपनी सामान्य जिंदगी और पर्यटन का आनंद ले सकें. फिलहाल तो, दीघा की लहरें भी सैलानियों के बिना उदास नजर आ रही हैं।