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1 करोड़ ₹ का पैकेज छोड़ अब अपार्टमेंट्स में साफ-सफाई क्यों कर रही है ये महिला, कहानी सुन दंग रह जाएंगे आप...

1 करोड़ ₹ का पैकेज छोड़ अब अपार्टमेंट्स में साफ-सफाई क्यों कर रही है ये महिला, कहानी सुन दंग रह जाएंगे आप...

Indian woman success story: किस्मत की बाजी कब पलट जाए, कोई नहीं जानता. कल तक जो 'मैडम' लंदन के बड़े दफ्तरों में एक करोड़ के पैकेज पर 'बॉस' बनकर बैठती थीं, आज वो मेलबर्न की गलियों में पराए फ्लैट्स का झाड़ू-पोछा कर रही हैं। सुनने में ये किसी फिल्मी कहानी का 'दुखद' हिस्सा लग सकता है, लेकिन मुंबई की श्वेता देसाई के लिए ये उनकी नई पहचान की शुरुआत है. जब हाथ में डिजाइनर बैग की जगह डस्टर आया, तो क्या बीती होगी उस रूह पर? आइए जानते हैं श्वेता के उस सफर के बारे में, जिसने साबित कर दिया कि इज्जत ओहदे में नहीं, मेहनत में होती है।

फर्श से अर्श तक नहीं, अर्श से फर्श तक का सफर (Career change struggle Australia)

लंदन की चकाचौंध, हाथ में डिजाइनर बैग और सालाना 1 करोड़ की भारी भरकम सैलरी...भला ऐसी 'मखमली' जिंदगी कौन छोड़ना चाहेगा? लेकिन मुंबई की श्वेता देसाई ने अपनों के लिए ये सब त्याग दिया और मेलबर्न की गलियों में अपार्टमेंट्स की सफाई तक की. उनकी ये कहानी दिल को छू लेने वाली और हिम्मत देने वाली है. जिंदगी कब पलटी मार जाए, कोई नहीं जानता. मुंबई की श्वेता देसाई, जो लंदन में बड़ी कंपनी की 'प्रोडक्ट हेड' थीं, उनके पास वो सब था जिसकी लोग हसरत करते हैं. साल 2023 में पति 'देव' की नौकरी मेलबर्न में लगी, तो श्वेता ने भी बिना सोचे समझे अपनी हाई-फाई नौकरी को 'अलविदा' कह दिया. उन्हें लगा था कि ऑस्ट्रेलिया में भी उनके टैलेंट के कद्रदान मिल जाएंगे, मगर मेलबर्न का जॉब मार्केट तो कुछ और ही तेवर दिखा रहा था।

जब मखमली हाथों ने उठाया झाड़ू-पोछा (Shweta Desai Melbourne cleaner)

महीनों भटकने के बाद जब कोई ढंग की नौकरी हाथ नहीं लगी, तो श्वेता ने वो काम किया जिसे करने में बड़े बड़े 'साहबों' की सिट्टी-पिट्टी गुम हो जाए. उन्होंने एयरबीएनबी (Airbnb) फ्लैट्स की सफाई और मैनेजमेंट का जिम्मा संभाला. चादरें बदलना, बर्तन धोना और मेहमानों के नखरे उठाना...ये सब उनकी नई दुनिया का हिस्सा बन गया. शुरुआत में उन्हें बड़ी कोफ्त हुई, खुद की पहचान खोने का डर सताया और जब कोई पूछता कि, 'मैडम, क्या करती हैं?', तो जबान लड़खड़ा जाती थी।

'पैसा ही असली आजादी और सुकून है...' (The biggest lesson from the struggle)

श्वेता की इस जद्दोजहद ने उन्हें एक बहुत बड़ा सबक सिखाया...काम छोटा नहीं होता, बस नीयत साफ होनी चाहिए. उन्होंने समझा कि असल इज्जत ओहदे में नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर होने में है. आज श्वेता सिर्फ सफाई ही नहीं कर रहीं, बल्कि बच्चों को अंग्रेजी पढ़ाती हैं और 'द रीबिल्ड रूम' नाम की कम्युनिटी के जरिए उन औरतों की मदद कर रही हैं, जो परदेस में अपनी पहचान ढूंढ रही हैं. उनका मानना है कि हाथ में पैसा हो, तो इंसान अपनी पसंद की आजादी खुद खरीद सकता है।

(डिस्क्लेमर: यह जानकारी सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो के आधार पर दी गई है। केसरी न्यूज 24 इसकी पुष्टि नहीं करता है।)