आज सुप्रीम कोर्ट की मर्यादा 3 बार हुई तार-तार, CJI के सामने गाली-गलौज से जूता फेंकने तक मचा बवाल, देश हुआ शर्मिंदा...
नईदिल्ली, न्यूज। देश की सर्वोच्च अदालत सिर्फ कानून का मंदिर ही नहीं, बल्कि लोकतंत्र में न्याय की सबसे बड़ी उम्मीद भी मानी जाती है। यहां हर शब्द और हर व्यवहार अदालत की गरिमा से जुड़ा होता है। लेकिन इतिहास में कुछ ऐसे भी पल दर्ज हैं, जब इसी अदालत की मर्यादा खुलेआम लांघी गई। आज शुक्रवार को एक याचिकाकर्ता ने सुनवाई के दौरान न सिर्फ कोर्ट रूम में कागज फेंके, बल्कि न्यायाधीशों के प्रति अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया। यह घटना उन चुनिंदा मामलों में शामिल हो गई, जब सुप्रीम कोर्ट के भीतर अनुशासन और गरिमा पर सवाल खड़े हुए।
कोर्ट में कागज फेंके, जजों को देने लगा निर्देश
शुक्रवार को जस्टिस के.वी. विश्वनाथन और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ के समक्ष प्रबल प्रताप नाम के याचिकाकर्ता की अपील पर सुनवाई चल रही थी। सुनवाई के दौरान उसने अचानक अदालत के भीतर कागज फेंकने शुरू कर दिए और न्यायाधीशों के प्रति अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किया। इतना ही नहीं, वह जजों को ही निर्देश देने लगा। स्थिति बिगड़ने पर सुप्रीम कोर्ट की सुरक्षा टीम को हस्तक्षेप करना पड़ा और उसे कोर्ट रूम से बाहर ले जाया गया।
2025 में CJI बी.आर. गवई पर जूता फेंकने की कोशिश
इससे पहले 6 अक्टूबर 2025 को तत्कालीन भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) बी.आर. गवई की अदालत में भी अभूतपूर्व घटना हुई थी। वकील राकेश किशोर ने सुनवाई के दौरान 'सनातन का अपमान नहीं सहेंगे' के नारे लगाते हुए CJI की ओर जूता उछालने की कोशिश की थी। हालांकि बाद में न्यायमूर्ति गवई ने इस घटना को 'भूली-बिसरी बात' बताते हुए ज्यादा महत्व नहीं दिया, लेकिन इस घटना ने देशभर में न्यायपालिका की सुरक्षा और अदालत की गरिमा को लेकर बहस छेड़ दी थी।
1999 में भी टूटी थी सुप्रीम कोर्ट की मर्यादा
सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में ऐसा एक बड़ा मामला 26 फरवरी 1999 को भी सामने आया था। वकील नंद लाल बलवानी बिना किसी सूचीबद्ध मामले के कोर्ट नंबर-1 में पहुंचे और तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश ए.एस. आनंद की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ पर जूता फेंक दिया। वह पुलिस एजेंसियों की ओर से कथित उत्पीड़न का आरोप लगाते हुए नारेबाजी कर रहे थे। इस घटना ने पूरे न्यायिक तंत्र को झकझोर दिया था।
अदालत ने दिखाई सख्ती, वकालत पर भी लगा प्रतिबंध
1999 की घटना पर सुप्रीम कोर्ट ने उसी दिन कड़ा रुख अपनाया। नंद लाल बलवानी को अदालत की घोर आपराधिक अवमानना का दोषी ठहराते हुए चार महीने की साधारण कैद और 2,000 रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई गई। बाद में बार काउंसिल ने भी उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करते हुए उनका नाम बार काउंसिल के रिकॉर्ड से हटाने और भविष्य में वकालत करने पर प्रतिबंध लगाने का फैसला किया। अदालत ने स्पष्ट कहा था कि न्यायिक फैसलों से असहमति का मतलब अदालत की गरिमा का अपमान करने का अधिकार नहीं हो सकता।
तीन घटनाएं, एक बड़ा संदेश
शुक्रवार की घटना, 2025 में जूता फेंकने की कोशिश और 1999 की अवमानना-ये तीनों मामले अलग-अलग समय के जरूर हैं, लेकिन इनसे एक ही संदेश निकलता है कि देश की सर्वोच्च अदालत की गरिमा बनाए रखना हर नागरिक और हर वकील की जिम्मेदारी है। लोकतंत्र में न्यायपालिका का सम्मान संविधान की मूल भावना का हिस्सा है और अदालत की मर्यादा से समझौता किसी भी परिस्थिति में स्वीकार नहीं किया जा सकता।