Headlines
Loading...
स्कार्फ हटाने से मना करने पर महिला को चाकू दिखाकर धमकाया, बरी होने के बाद भी हाईकोर्ट से नहीं मिली राहत...

स्कार्फ हटाने से मना करने पर महिला को चाकू दिखाकर धमकाया, बरी होने के बाद भी हाईकोर्ट से नहीं मिली राहत...

जबलपुर: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी सरकारी कर्मचारी के आपराधिक मामले में बरी हो जाने मात्र से विभागीय कार्रवाई में दी गई सजा स्वतः समाप्त नहीं हो जाती।कोर्ट ने कहा कि विभागीय जांच और आपराधिक मुकदमे के उद्देश्य एवं साक्ष्य के मानदंड अलग-अलग होते हैं।

हाईकोर्ट के जस्टिस दीपक खोत की एकलपीठ ने रीवा पुलिस लाइन में पदस्थ रहे पूर्व आरक्षक रामपाल अहिरवार की बर्खास्तगी को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता अनुशासित बल का सदस्य था और उसने ड्यूटी के दौरान आधिकारिक वर्दी में गंभीर कदाचार किया था।

याचिका में कहा गया था कि वर्ष 2017 में दर्ज आपराधिक प्रकरण के आधार पर विभागीय जांच के बाद 6 अगस्त 2018 को उसे सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था। बाद में आपराधिक मामले में संदेह का लाभ मिलने पर दोषमुक्त किए जाने के बाद उसने विभागीय बर्खास्तगी निरस्त करने की मांग की, लेकिन विभाग ने उसकी अपील खारिज कर दी।

स्कार्फ हटाने से इंकार पर चाकू दिखाकर धमकाया था

सरकार की ओर से बताया गया कि 10 जुलाई 2017 को एक महिला ने आरोप लगाया था कि ऑटो में सफर के दौरान स्कार्फ हटाने से इनकार करने पर आरक्षक ने चाकू दिखाकर धमकाया था। शिकायत के आधार पर उसके खिलाफ सिविल लाइंस थाने में भारतीय दंड संहिता की धारा 294, 323, 506 तथा आर्म्स एक्ट के तहत मामला दर्ज किया गया था। इसी घटना के आधार पर विभागीय जांच भी शुरू हुई।

पहले पहचान की, बाद में मुकर गई थी

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि विभागीय जांच में शिकायतकर्ता महिला ने स्पष्ट रूप से आरक्षक की पहचान करते हुए आरोपों की पुष्टि की थी। हालांकि, बाद में आपराधिक मुकदमे की सुनवाई के दौरान वह अपने बयान से मुकर गई और आरोपी को पहचानने से इनकार कर दिया, जिसके कारण उसे संदेह का लाभ मिल गया।

अदालत से बरी होना, विभागीय दंड समाप्त का आधार नहीं

कोर्ट ने कहा कि आपराधिक मामलों में दोष सिद्ध करने के लिए कठोर एवं संदेह से परे साक्ष्य आवश्यक होते हैं, जबकि विभागीय जांच में 'संभावनाओं की अधिकता' के आधार पर निर्णय लिया जाता है। इसलिए आपराधिक अदालत से बरी होना विभागीय दंड समाप्त करने का आधार नहीं बनता।

विभागीय जांच का उद्देश्सय सेवा अनुशासन बनाए रखना है

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि आपराधिक मुकदमे का उद्देश्य अपराधी को दंडित करना होता है, जबकि विभागीय जांच का उद्देश्य सेवा नियमों और अनुशासन बनाए रखना है। इन दोनों प्रक्रियाओं के उद्देश्य और मानक अलग होने के कारण विभागीय बर्खास्तगी को वैध मानते हुए याचिका खारिज कर दी।