कौन हैं संतोष दुबे जिनको राम मंदिर चंदा चोरी की जांच कर रही SIT पर भरोसा नहीं, रामजन्म भूमि आंदोलन में खाई थीं 4 गोलियां...
अयोध्या: राम मंदिर में चढ़ने वाले पैसे और जेवरों की चोरी का मामला सामने आने के बाद हर कोई हैरान है। स्पेशल इनवेस्टीगेशन टीम की जांच के बाद अयोध्या पुलिस ने आठ आरोपियों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है। इनसे पूछताछ में कई बड़े खुलासे हुए हैं।
इस पूरे मामले में हिंदू धर्म सेना के प्रमुख संतोष दुबे का नाम प्रमुखता से सामने आया है। दरअसल, संतोष दुबे ही वह शख्स हैं जिन्होंने इस चोरी को लेकर रामजन्मभूमि थाने में एफआईआर दर्ज कराने के लिए तहरीर दी है।
अयोध्या के रहने वाले पूर्व कारसेवक संतोष दुबे ने सभी आरोपियों का पॉलीग्राफ टेस्ट कराए जाने की मांग की है। उन्होंने कहा कि इस घटना से रामभक्तों की भावनाएं आहत हुई हैं। उन्हें एसआईटी पर भरोसा नहीं है। ये टीम दबाव में आ जाएगी। मुख्यमंत्री को खुद अयोध्या आकर पूरी स्थिति देखनी चाहिए।
एसआईटी का कोई मतलब नहीं होता: संतोष दुबे
संतोष दुबे का कहना है कि हमने आरोपियों के खिलाफ तहरीर इसलिए दी है ताकि एसआईटी के पास ये बहाना ना हो कि किसी ने तहरीर नहीं दी। हमने इस तहरीर में चार लोगों के नाम भी लिखे हैं- चंपत राय, अनिल मिश्र, गोपाल राव और चंपत राय के ड्राइवर राम शंकर यादव उर्फ टिन्नू। एसआईटी का कोई मतलब नहीं होता क्योंकि एसआईटी उन्हीं के दबाव में काम करेगी। इसलिए मुख्यमंत्री या तो स्वयं जांच करें या पुलिस पर छोड़ दें।
16 साल की उम्र में बने थे कारसेवक
आपको बता दें कि संतोष दुबे 16 साल की उम्र में राम मंदिर आंदोलन में जुड़े थे। वह बाबरी विध्वंस के मुख्य आरोपी भी रहे हैं। आंदोलन के दौरान उन्हें चार गोलियां लगी थीं। वह 22 दिनों तक कोमा में रहे। 6 दिसंबर, 1992 को ढांचा तोड़ते समय उनके शरीर की 17 हड्डियां टूट गई थीं। 1994 और 2000 में उनके ऊपर एनएसए लगा जिसके तहत उनको जेल जाना पड़ा था।
अयोध्या के अस्पताल ने मृत घोषित कर दिया था
एक मीडिया एजेंसी से बातचीत में संतोष दुबे ने बताया था कि उनकी 17 हड्डियां टूट गई थीं। उनको अयोध्या के श्रीराम अस्पताल ले जाया गया। वहां डॉक्टरों ने उनको मृत घोषित कर दिया था पर साथियों ने कहा कि जब तक राम मंदिर नहीं बन जाएगा तब तक ये मरने वाले नहीं है। इसके बाद उनको लखनऊ के अस्पताल में भर्ती कराया गया।
पिता ने कहा था- ढांचा तोड़कर ही आना, पीठ मत दिखाना
संतोष दुबे ने बताया कि उनके पिता जी सेकेंड वर्ल्ड वॉर के सेनानी थी। उन्होंने कहा था कि जा रहे हो तो ढांचा गिराकर ही आना। पीठ मत दिखाना अगर गोलियां चलती हैं तो मर जाना लेकिन काम पूरा करके आना। लाश तुम्हारी तब ही उठाएंग जब रामकाज हो जाएगा।