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हिंदू समाज से एकजुट होने और संतानों को इतिहास से परिचित कराने का आह्वान, सनातन रक्षा के लिए संत आगे आएं : साध्वी ऋतम्भरा...

हिंदू समाज से एकजुट होने और संतानों को इतिहास से परिचित कराने का आह्वान, सनातन रक्षा के लिए संत आगे आएं : साध्वी ऋतम्भरा...

हिंदू समाज से एकजुट होने और संतानों को इतिहास से परिचित कराने का आह्वान...।
मानसिक कष्टों को आत्मिक विकास का माध्यम बताया...।

पुरी, न्यूज। श्री जगन्नाथ धाम, पुरी स्थित होटल सेवन हिल्स में परमशक्ति पीठ की ओर से आयोजित 'श्रीमद्भागवत कथा महोत्सव' के तृतीय दिवस पर कथाव्यास पद्म भूषण विभूषिता वात्सल्यमूर्ति पूज्या दीदी माँ साध्वी ऋतम्भरा जी ने सनातन धर्म की रक्षा और हिंदू समाज के जनजागरण के लिए साधु-संतों से सक्रिय भूमिका निभाने का आह्वान किया।

उन्होंने कहा कि साधु-संतों को केवल मठों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि समाज के बीच जाकर सनातन धर्म की रक्षा और हिंदू समाज को जागृत करने का कार्य करना चाहिए। उन्होंने जातिगत भेदभाव छोड़कर हिंदू समाज से एकजुट होने तथा नई पीढ़ी को देश और सनातन धर्म के इतिहास से परिचित कराने की अपील की। 

इस अवसर पर मुख्य यजमान भुवनेश्वर निवासी श्री ताराचंद शर्मा, श्री मुरली शर्मा, श्रीमती अनीता शर्मा और शिवानी शर्मा ने व्यासपीठ का पूजन-अर्चन किया।

व्यासपीठ से हिंदू समाज की स्थिति और उसके लिए संत समाज की भूमिका पर चर्चा करते हुए पूज्या दीदी माँ साध्वी ऋतम्भरा जी ने कहा कि साधुता केवल मठाधीश बनकर मठों में बैठे रहने का नाम नहीं है। प्रत्येक साधु को सनातन धर्म की रक्षा और हिंदू समाज के जनजागरण के लिए निरंतर कार्य करना चाहिए। 

उन्होंने कहा कि समाज ने साधु-संतों को सम्मान और सेवा दी है, इसलिए संत समाज का भी दायित्व है कि वह धर्म और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाए।

उन्होंने हिंदू समाज से जातिगत भेदभाव छोड़कर एकजुट होने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि दुनिया में प्रत्येक समाज अपने भविष्य के प्रति सजग रहता है, इसलिए हिंदू समाज को भी अपने भविष्य और अपनी सांस्कृतिक पहचान के प्रति जागरूक होना होगा। 

उन्होंने कहा कि इतिहास को भूलने के बजाय उससे सीखने की जरूरत है और अपनी संतानों को भी सनातन धर्म तथा देश के इतिहास से परिचित कराना चाहिए। दीदी माँ ने कहा कि समाज को अपनी एकता की शक्ति को समझना होगा। उन्होंने कोणार्क के सूर्य मंदिर का उल्लेख करते हुए कहा कि देश के अनेक धार्मिक और ऐतिहासिक स्थलों ने विभिन्न दौर में संकटों का सामना किया है। 

उन्होंने कहा कि कोणार्क की कहानी केवल एक मंदिर की कहानी नहीं है, बल्कि देश के अनेक धार्मिक और सांस्कृतिक स्थलों के संघर्ष की कहानी है। इसलिए आने वाली पीढ़ी को अपनी विरासत के बारे में जानकारी देना आवश्यक है।

उन्होंने हिंदू समाज को जागरूक रहने का आह्वान करते हुए कहा कि सामाजिक विभाजन से समाज कमजोर होता है। उन्होंने सनातन समाज से आपसी भेदभाव समाप्त कर एकजुट होने तथा अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं की रक्षा के लिए सजग रहने की अपील की।

मानसिक कष्टों को आत्मिक विकास का माध्यम बताया

जीवन के मानसिक कष्टों और उनसे उबरने के उपायों पर चर्चा करते हुए पूज्या दीदी माँ साध्वी ऋतम्भरा जी ने कहा कि दर्द भगवान का हथौड़ा है। उन्होंने कहा कि कठिन परिस्थितियों से गुजरने की प्रक्रिया व्यक्ति को सहनशील और तेजस्वी बनाती है तथा उसे परमात्मा की ओर मोड़ती है।

उन्होंने कहा कि जब कोई अपना व्यक्ति शब्दों की चोट पहुंचाता है तो व्यक्ति भीतर से आत्मचिंतन करने लगता है और भगवान की ओर उन्मुख होता है। सुख के समय मनुष्य अक्सर ईश्वर को याद नहीं करता, लेकिन दुख और कठिनाइयां उसे परमात्मा के करीब ले जाती हैं। 

उन्होंने कहा कि उपेक्षा से दुखी होने के बजाय उसे वैराग्य की दिशा में आगे बढ़ने का अवसर समझना चाहिए। यही प्रक्रिया जीवन को सार्थक बनाने और जीते जी मुक्ति के मार्ग को खोलने वाली हो सकती है।