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शिमला के इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडी पूर्व चेयरपर्सन पद्मभूषण प्रो.कपिल कपूर ने कहा, विकास को भौतिक उपलब्धियों तक सीमित न करें...

शिमला के इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडी पूर्व चेयरपर्सन पद्मभूषण प्रो.कपिल कपूर ने कहा, विकास को भौतिक उपलब्धियों तक सीमित न करें...

वाराणसी, न्यूज। विकास को केवल भौतिक उपलब्धियों और सुख-सुविधाओं से जोड़कर देखने के बजाय मानवीय चेतना, आंतरिक कल्याण और सामाजिक उत्तरदायित्व के व्यापक संदर्भ में समझने का प्रयास करना चाहिए।भारतीय सभ्यता की दृष्टि में अस्तित्व की एकता और सभी जीवन रूपों की परस्पर निर्भरता बहुत ही महत्वपूर्ण है। 

ये बातें शिमला के इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडी के पूर्व चेयरपर्सन पद्मभूषण प्रो. कपिल कपूर ने कहीं। वह शुक्रवार को बीएचयू के सामाजिक विज्ञान संकाय के समाजशास्त्र विभाग की ओर से आयोजित अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी को बतौर मुख्य अतिथि संबोधित कर रहे थे। 

'बदलता जेंडर : विकास, इंटरसेक्शनैलिटी और भारत में नई संभावनाओं पर पुनर्विचार' विषयक संगोष्ठी में उन्होंने कहा कि समाज के किसी भी प्रश्न पर विचार करते समय उसके तात्कालिक प्रभावों के साथ भावी पीढ़ियों और सामाजिक संबंधों पर पड़ने वाले दीर्घकालीन प्रभावों को भी समझना चाहिए।

समय और परिस्थितियों के अनुसार सामाजिक व्यवस्थाओं में बदलाव आवश्यक है। मानवीय गरिमा, विविधता के सम्मान और सामूहिक कल्याण जैसे मूल्यों को बनाए रखना सभी का समान दायित्व है। 

अध्यक्षीय संबोधन में बीएचयू के वीसी प्रो.अजित कुमार चतुर्वेदी ने कहा कि भारतीय समाज में पिछले पांच-छह दशकों में जेंडर भूमिकाओं, पहचान, जागरूकता, स्वीकृति और अवसरों के क्षेत्र में उल्लेखनीय परिवर्तन हुए हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था और संविधान में निहित मूल्यों ने इस परिवर्तन को आधार दिया है। हालांकि समानता और अवसरों की दिशा में अभी लंबा रास्ता तय करना शेष है।

मुख्य वक्ता कन्याकुमारी के विवेकानंद केंद्र के अध्यक्ष पद्मश्री निवेदिता रघुनाथ भिड़े ने जेंडर के प्रश्नों को भारतीय समाज के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और दार्शनिक संदर्भों में देखने का आग्रह किया। उनके संबोधन में बृहदारण्यक उपनिषद के याज्ञवल्क्य-मैत्रेयी संवाद का उल्लेख आया, जो भारतीय दार्शनिक परंपरा में स्त्री की विचारशीलता और ज्ञान-संबंधी जिज्ञासा का महत्वपूर्ण उदाहरण हैं। 

उद्घाटन सत्र के बाद दो प्लेनरी सत्र हुए। इनमें डॉ.आशीष सक्सेना डॉ.बुला भद्रा, प्रो.अपर्णा रायप्रोल, डॉ.देवनाथ पाठक प्रो.बीके.नगला, डॉ.मनीष के.वर्मा, डॉ.सौम्यजीत पात्रा, डॉ.अजैलिउ नियुमाई, डॉ.रजनी बाला, डॉ.राजीव दूबे ने विचार व्यक्त किए। 

अतिथियों का स्वागत समाजशास्त्र विभागाध्यक्ष प्रो. श्वेता प्रसाद, संचालन आर्या तथा धन्यवाद ज्ञापन डॉ.पंकज सिंह ने किया।